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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, लख चैरासी धार में, बहे जात है हंस।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, अलख लखाया बंस ।।41।।

इस संसार सागर में जन्म-मरण रूपी चैरासी लाख धाराएं हैं जिसमें अनेक जीवात्मा रूपी हंस बहे जा रहे हैं परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं, जिन्होंने हमें अपने वंश में मिला लिया है अर्थात्, अलख पुरूष के दर्शन करा दिए हैं।

गरीब, माया का रस पीव कर, फूटि गये दो नैन ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, बास दिया सुख चैन ।।42।।

इस संसार की माया का रस पीकर अनेक प्राणियों के ज्ञान ओर विवेक रूपी दो चक्षु फूट गए हैं अर्थात् माया के मद में जीव अन्धे हो गए हैं। परन्तु हमें ऐसा सत्गुरू मिल गया है जिसने इस माया के मद से छुड़ा कर सुख शान्ति में हमारा निवास करा दिया है।

गरीब, माया का रस पीय कर, हो गये डामा डोल ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, ज्ञान जोग दिया खोल ।।43।।

इस संसार में अनेक प्राणी माया के नशे में इस प्रकार डामांडोल हो गए हैं कि उन्हें अपने मालिक, प्रभु-परमात्मा की याद भूल गई है। परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जिन्होंने ज्ञान योग के द्वारा अपने निजधाम का द्वार हमारे लिए खोल दिया है।

गरीब, माया का रस पीय कर, हो गये भूत खईस ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, भक्ति दई बख्शीश ।।44।।

इस संसार की माया का नशा पीकर अनेक प्राणी भूत प्रेत की जून में चले गये हैं। परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गये हैं जिन्होंने हमें भक्ति की बख्सीस देकर अपने निज स्रूप में मिला लिया है।

गरीब, माया का रस पीय कर, फूट गये पट चार।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, लोयन संख उधार ।।45।।

इस संसार में माया का नशा पीकर अनेक प्राणियों की दो बाहर और दो अन्दरूनी ज्ञान, विवेक रूपी आंखें फूट गई हैं। परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जिन्होंने हमारे ज्ञान रूपी अनेकों दिव्य नेत्र खोल दिए हैं। जिससे हमारा अज्ञान रूपी अन्धकार दूर हो गया है।