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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, खोले बजर कपाट।
अगम भूमि कूँ गम करी, उतरे औघट घाट ।।26।।

हमें ऐसा सत्गुरू मिल गया है जिसने दशम-द्वार के दरवाज़े खोल दिए हैं। सत्गुरू की कृपा से अगमलोक ;जहां किसी की पहंच नहींद्ध में प्रविष्ट हो गए हैं जो दुर्गम घाटी है। उसे हमने पार कर लिया है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, मारी ग्यासी गैन।
रोम रोम में सालती, पलक नहीं है चैन ।।27।।

हमें ऐसा सत्गुरू मिल गया है जिसने ज्ञान रूपी ज्ञयासी ;एक नोकीला हथियार, जो दुश्मन के पेट की आंतें खींच लेता हैद्ध ऐसी मारी है, जिससे हमारे रोम-रोम में प्रभु को मिलने की तड़प इतनी ज्यादा हो गई है कि पल भर भी हमें उसके बिना चैन नहीं मिल रहा है।

गरीब, सतगुरू भलका खैंच करि, लाया बान जु एक ।
स्वांस उभारे सालता, पड्या कलेजे छेक ।।28।।

सत्गुरू देव जी ने ज्ञान रूपी कमान से शब्द रूपी बाण खींच कर ऐसे मारा कि मेरे मन में छेद हो गया। अर्थात् प्रभु को मिलने की बेचैनी पैदा हो गई। शरीर में आते जाते स्वास प्रभु को मिलने हेतु हर पल बेचैन रहने लगे।

गरीब, सतगुरू मारया बान कसि, खैबर ग्यासी खैंच।
भरम कर्म सब जरि गये, लई कुबुधि सब ऐंच ।।29।।

सत्गुरू देव जी ने शब्द स्वरूप बाण, खैबर और ग्यासी इस तरह खींच कर मारे कि उससे मेरी सारी कुबुवि हर ली। मेरे समस्त भ्रम और कर्म आदि दोष जल गए।

गरीब, सतगुरू आये दया करि, ऐसे दीन दयाल।
बंदीछोड़ बिरद तास का, जठर अग्नि प्रतिपाल ।।30।।

सत्गुरू देव जी हम पर दया कर प्रकट हुए। वे ऐसे दीन दयाल हैं जो दीन-दुखियों पर दया करते हैं। उस सत्गुरू देव जी का नाम बन्दी छोड़ है। जीव के बन्धन छुड़ाना ही उनका बिरद है। वही माता के गर्भ में जठराग्नि से जीव की रक्षा और पालन करते हैं।