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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, जम जौरा जासें डरैं, मिटे कर्म के लेख।
अदली अदल कबीर हंै, कुल के सतगुरू एक ।।36।।

यम और उसकी सेना के यमदूत जिससे डरते हैं, जो सेवक के कर्मों के लेख मिटा देते हैं। ऐसे अदली पुरूष कबीर कुल दुनिया के मालिक हैं।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, पहँुच्या मंझ निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर, पार किये प्रवान ।।37।।

संसार रूपी भव सागर में डूबते हुए हमें ऐसे खेवट सत्गुरू जी मिल गए, जिन्होंने नाम के जहाज़ पर चढ़ा कर पार कर दिया है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, भवसागर के माहिं।
नौका नाम चढ़ाय करि, ले राखे निज ठाहिं।।38।।

संसार रूपी भवसागर में ऐसे सत्गुरू हमें मिल गए जिन्होंने नाम के जहाज पर चढ़ा कर हमें अपने निजधाम में पहुंचा दिया है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ।।39।।

संसार रूपी भवसागर में हमें ऐसा सत्गुरू मिल गया जो भवसागर से पार करने वाला मल्लाह है। जो इस मल्लाह के बेड़े में बैठ जाता है, चाहे वह धर्मी है, चाहे वह पापी है, सत्गुरू देव जी बिना भेदभाव के सबको पार कर देते हैं।

गरीब, चैरासी की धार में, बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, ले परसाया पीव ।।40।।

इस संसार रूपी भवसागर में जन्म मरण रूपी चैरासी लाख धाराएं हैं जिनमें अनेक जीव बहते जा रहे हैं। परन्तु हमे इस संसार रूपी भवसागर में ऐसा सत्गुरू मिल गया है जिसने हमारा पीव से मेल करा दिया है।