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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, औघट घाटी ऊतरे, सतगुरू के उपदेश।
पूर्ण पद प्रकाशिया, ज्ञान जोग प्रवेश।।81।।

सत्गुरू जी के उपदेश से हमने दुर्गम घाटी को पार कर लिया है। सत्गुरू देव जी के उपदेश रूपी ज्ञान योग से हमारे मन में पूर्ण पारब्रह्म का प्रकाश हमें दिखाई दे रहा है।

गरीब, सुन्न सरोवर हंस मन, न्हाया सतगुरू भेद।
सुरति निरति परचा भया, अष्ट कमल दल छेद।।82।।

सुन्न मण्डल में जो अमृत सरोवर है, उसमें हमारे हंस रूपी मन ने सत्गुरू द्वारा बताई गई युक्ति के साथ स्नान किया है। शरीर के आठों कमलों का छेदन करके ही सुरति-निरत द्वारा पारब्रह्म का दर्शन पाया जाता है।

गरीब, सुंनि बेसुंनि से अगम है, पिंड ब्रह्मंड से न्यार।
शब्द समाना शब्द में, अविगत वार न पार ।।83।।

वह पारब्रह्म प्रभु सुन्न और बेसुन्न से भी परे है। शरीर और संसार से भी न्यारा है। शब्द भी शब्द में समा जाता है परन्तु अविगत पुरूष का कोई पार नहीं है। शब्द से भी परे है।

गरीब, सतगुरू कूं कुरबान जां, अजब लखाया देश।
पार ब्रह्म प्रवान है, निरालंभ निज नेश ।।84।।

मैं ऐसे सत्गुरू से कुर्बान जाता हूं जिसने कृपा करके मुझे निराला ही देश दिखा दिया है। जहां पारब्रह्म प्रभु बिना आधार के अपने आप में लीन होकर बिराज रहे हैं।

गरीब, सतगुरू सोहं नाम दे, गुझ बीरज विस्तार।
बिन सोहं सीझै नही, मूल मंत्र निज सार ।।85।।

सत्गुरू देव जी ही जिज्ञासु को एक गुप्त मंत्र समझाते हैं कि हे हंस! यही मूल मंत्र सार है। इस सोहं को समझे बिना आत्म तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह सिर्फ गुरू के द्वारा ही समझा जा सकता है।