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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के मंझ।
अंड्यों आनन्द पौष है, बैन सुनाये कुंज ।।11।।

सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए जैसे कुंज पक्षी अपने ध्यान और आवाज़ से बहुत दूर पड़े अण्डों को पालता है। इसी तरह सत्गुरू भी अपनी कृपा-दृष्टि के द्वारा हमारा पालन-पोषण करते हैं।

गरीब ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के नाल ।
पीतांबर ताखी धरयौ, बानी शब्द रिसाल ।।12।।

सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सत्गुरू मिले हैं जिन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर पर पीताम्बर ;पीले कपड़ेद्ध धारण किये हैं। उनकी वाणी के शब्द प्रेम-रस से परिपूर्ण है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के नाल।
गमन किया परलोक से, अलल पंख की चाल ।।13।।

सुरति रूपी सागर के बीच हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जिन्होंने हमें अपने सत्लोक में इस तरह बुला लिया है जिस तरह अलल पक्षी अपने बच्चों को सुन्न मण्डल में अपनी सुरति के ज़ोर से बुला लेता है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के नाल।
ज्ञान जोग अरू भक्ति सब, दीन्ही नजर निहाल ।।14।।

सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सत्गुरू जी मिल गए हैं जिन्होंने ज्ञान योग और भक्ति योग देकर अपनी दया दृष्टि से हमें निहाल कर दिया है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, बेपरवाह अबंध।
परमहंस पूर्ण पुरूष, रोम रोम रविचन्द ।।15।।

हमें ऐसे निर्भय सत्गुरू मिल गए हैं जिनके उपर किसी की भी हकूम अथवा प्रतिबन्ध नहीं है। ऐसे परम हंस पूर्ण पुरूष सत्गुरू हैं, जिनके रोम-रोम में सूर्य और चंद्रमा चमकते हैं।