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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, पट्टन घाट लखाईया, अगम भूमि का भेव।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, अष्ट कमल दल सेव ।।66।।

हमें ऐसा सत्गुरू मिल गया है जिसने शरीर के अष्ट कमलों का छेदन कर दशम द्वार के मार्ग अगमभूमि का भेद बता दिया है। जिस कारण हमने उस उाम लोक को देख लिया है।

गरीब, प्रपट्टन की पीठ में , सतगुरू ले गया मोहि।
सिर साटे सौदा हुआ, अगली पिछली खोहि ।।67।।

सत्गुरू जी मुझे प्रपट्टन ;उत्तम नगरद्ध के पीठ ;बाजारद्ध में ले गए। उस बाज़ार में मेरे सिर का सौदा हो गया। सिर के सौदे से अगले-पिछले सारे कर्म नष्ट हो गए और मैं मोक्ष का अधिकारी बन गया।

गरीब, प्रपट्टन की पीठ में, सतगुरू लें गया साथ।
जहां हीरे मानिक बिकंै, पारस लाग्या हाथ ।।68।।

महाराज जी कहते हैं कि उस उत्तम लोक के बाजार में सतगुरू देव जी मुझे अपने साथ ले गए, जहां हीरे और माणिक ;ज्ञान, विवकद्ध बिक रहे थे। हमें सिर के बदले में पारस हाथ लग गया अर्थात् उस सौदे ने हमें जीव से ब्रह्म बना दिया।

गरीब, प्रपट्टन की पीठ में, है सतगुरू की हाट।
जहां हीरे मानिक बिकैं, सौदागर स्यूं साट ।।69।।

उस उत्तम नगर के बाज़ार में सत्गुरू जी की दुकान लगी हुई है। उस दुकान में नाम और प्रेम रूपी हीरे मोती बिकते हैं। जीव रूपी सौदागर अपने सिर के बदले में उसका सौदा करते हैं।

गरीब, प्रपट्टन की पीठ में, सौदा है निज सार।
हम कूँ सतगुरू ले गया, औघट घाट उतार ।।70।।

उस उत्तम लोक के बाजार में आत्मतत्व की प्राप्ति रूपी सार सौदा बिकता है। हमें सत्गुरू देव जी कठिन रास्ते में से बड़ी आसानी से पार ले गए। अर्थात् हमें सत्गुरू देव जी की कृपा से आत्म साक्षात्कार हो गया।