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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, शीश तुम्हारा जायेगा, कर सतगुरू की भेंट।
नाम निरंतर लीजिये, जम की लगै न फेंट ।।51।।

हे प्राणी! तेरा शीश एक दिन चला जाएगा, मौत हो जाएगी। इसको लेखे में लगाने के लिए पहले ही सत्गुरू की भेंट चढ़ा दे अर्थात् अपने अहंकार को त्याग कर सत्गुरू साहिब का नाम लगातार जप ले। इससे यमों की मार से बच जाएगा।

गरीब, साहिब से सतगुरू भये, सतगुरू से भये साध।
ये तीनो अंग एक है, गति कुछ अगम अगाध ।।52।।

सत्गुरू गरीब दास महाराज जी फरमाते हैं कि कुल मालिक साहिब ने ही सत्गुरू जी का रूप धारण किया है और सत्गुरू जी ही सत्यवादी साधू बन कर आए हैं। ये तीनों स्वरूप अलग-अलग होते हुए भी एक ही रूप में हैं। इन तीनों की गति अपरम्पार है। इनकी महिमा को जानना बहुत कठिन है।

गरीब, साहिब से सतगुरू भये, सतगुरू से भये संत।
धर धर भेष विशाल अंग, खेलैं आदि अरू अंत ।।53।।

साहिब प्रभु ने ही सत्गुरू जी का रूप धारण किया है और सत्गुरू ही सन्त रूप में आए हैं। साहिब बारम्बार ऐसे रूप धारण कर सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक आते जाते रहते हैं। सृष्टि में प्रभु का ऐसा ही खेल है।

गरीब, ऐसा सतगुरू सेईये, बेग उतारे पार।
चैरासी भ्रम मेट हीं, आवा गवन निवार ।।54।।

ऐसे सत्गुरू की सेवा और उपासना करो, जो तुरंत संसार सागर से पार उतार दे। चैरासी लाख योनियों के चक्कर को समाप्त करके अर्थात् जन्म-मरण का दुःख समाप्त कर दे।

गरीब, अंधे गूंगे गुरू घनें, लंगड़े लोभी लाख।
साहिब से परचे नहीं, काब बनावैं साख ।।55।।

संसार में ढोंग रचने वाले अन्धे, गूंगे, लंगड़े और लोभी लाखों गुरू बने हुए हैं अर्थात् ज्ञान और विवेक से खाली हैं। जिनका साहिब प्रभु से कभी मेल नहीं हुआ। केवल दोहे, साखिया बोल कर सुनाते हैं।