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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, भँवर गुफा में बैठ करि, अभी महारस जोख।
ऐसा सतगुरू मिल गया, सौदा रोकम रोक ।।76।।

हमें ऐसा सतगुरू मिल गया है जो भंवर गुफा में बैठकर अमृतरस तौल रहा है। जिस अमृत को पीकर प्राणी का जन्म-मरण कट जाता है। इस अमृत का सौदा, जो कि सिर के बदले में मिलता है, यह नगद का सौदा है इसमें उधार नहीं है।

गरीब, भँवर गुफा में बैठ करि, अमी महारस तोल।
ऐसा सतगुरू मिल गया, बजर पौलि दई खोल ।।77।।

हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जिन्होंने दशम द्वार के सख्त किवाड़ खोल दिए हैं। उस भंवर गुफा में बैठकर सत्गुरू अमृत महारस तोलते हैं भाव प्राण-आत्मा को अमृत महारस पिलाते हैं।

गरीब, भँवर गुफा में बैठ करि, अमी महारस जोख।
ऐसा सतगुरू मिल गया, ले गया हम परलोक ।।78।।

भंवर गुफा ;दशम द्वारद्ध में बैठकर सत्गुरू जी अमृत रस तौल रहे हैं ऐसे सत्गुरू हमें मिल गए जो हमें उत्तम लोक ;सत्यलोकद्ध में ले गए हैं।

गरीब, पिंड ब्रह्मंड से अगम है, न्यारी सिन्धु समाधि।
ऐसा सतगुरू मिल गया, देख्या अगम अगाध ।।79।।

महाराज जी कहते हैं कि सुरति और शब्द का मिलाप, जिसके द्वारा समाधि लगती है, वह शरीर और संसार से परे है। हमें ऐसे सतगुरू मिल गए हैं जिनकी कृपा से हम अगम-अगाध प्रभु को देख लिया है।

गरीब, पिंड ब्रह्मंड से अगम है, न्यारी सिन्धु समाधि।
ऐसा सतगुरू मिल गया, दिया अखै प्रसाद ।।80।।

सुरति शब्द के योग से समाधि लगती है, वह शरीर और संसार से परे है। हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जिन्होंने मोक्ष पद रूपी कभी भी समाप्त न होने वाला प्रशाद हमें दिया है।