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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, जठर अग्नि से राखिया, प्याया अमृत खीर ।
जुगन जुगन सतसंग है, समझ कुट्टन बेपीर ।।31।।

सत्गुरू देव जी माता के गर्भ में जठराग्नि से प्राणी की रक्षा करते हैं और अमृतमय दूध पिला कर पालन करते हैं। हे मनमुख कुटिल प्राणी! उस सत्गुरू की कृपा को समझ जो सत्गुरू युगों-युगों से तेरे सदैव अंग-संग रहते हैं। सत्गुरू जी हर प्रकार से तेरी रक्षा करते हैं। उनके चरण कंवलों का ध्यान कर।

गरीब, जूनी संकट मेटि है, औंधे मुख नहीं आय।
ऐसा सतगुरू सेईये, जम से लेई छुड़ाय।।32।।

हे प्राणी! सत्गुरू जीव का चैरासी लाख योनियों का संकट समाप्त कर देते हें। फिर वह प्राणी माता के गर्भ में उल्टा लटका हुआ जन्म नहीं लेता। ऐसे भयानक दुःख से छुड़ा लेने वाले सत्गुरू की तू शरण में आ जा। उनकी सेवा कर। वह तुम्हें यमदूतों से भी छुड़ा लेंगे।

गरीब, जम जौरा जासें डरै, धर्मराय के दूत।
चैदह कोटि न चंप हीं, सुन सतगुरू की कूत ।।33।।

सत्गुरू देव जी कहते हैं कि धर्मराज के दूत यम जौरा इत्यादि की सेना चैदह करोड़ है, वे सब सत्गुरू साहिब जी से डरते हें। जो सत्गुरू साहिब जी का सेवक है, उसके मुख से सत्गुरू देव जी के नाम की गुंजार सुनकर उसके पास नहीं आते।

गरीब, जम जौरा जासें डरैं, धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरू एक है, अदली अदल कबीर ।।34।।

यम, जौरा इत्यादि जिससे डरते हैं और धर्मराज भी जिसके आगे धैर्य धारण कर प्रार्थना करता है। ऐसे सत्गुरू साहिब समस्त सृष्टि में एक हैं, वे अदली पुरूष कबीर जी हैं।

गरीब, जम जौरा जासें डरैं, मिटे कर्म के अंक।
कागज कीरै दरगह दई, चैदह कोटि न चंप ।।35।।

ऐसे सत्गुरू कबीर साहिब से यम और उसकी सेना सब डरते हैं। जो सत्गुरू देव जी का सेवक है, उसके कर्मों के लेख सत्गुरू जी मिटा देते हैं। धर्मराज के दरबार में चित्रगुप्त के लिखे हुए कर्मों के लेख के कागज़ सत्गुरू जी फाड़ देते हैं।