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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सिंधु सुरति की सैन।
उर अंतर प्रकाशिया, अजब सुनाये बैन ।।6।।

हमें ऐसा सत्गुरू मिला, जिसने सुरति शब्द का ध्यान करने का संकेत दे दिया। इस सुरति शब्द का ध्यान करने से हमारे मन में प्रकाश हो गया। ऐसा अनुपम उपदेश हमें सुना दिया है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु की सैल।
बजर पौलि पट खौल कर, ले गया झीनी गैल ।।7।।

सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए, जिन्होंने दशम द्वार में लगे हुए पक्के द्वार ;किवाडद्ध खोल दिये और हमें अति बारीक रस्ते में से अपने धाम में ले गए।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के तीर ।
सब संतन सिरताज है, सतगुरू अदल कबीर ।।8।।

हमें सुरति रूपी सागर के किनारे पर ऐसा सत्गुरू मिल गया जिसका नाम अदली पुरूष कबीर है। वह सब संतों का सिरताज है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, सुरति सिंधु के मांहिं।
शब्द सरूपी अंग है, पिंड प्राण नहीं छाहिं।।9।।

हमें सुरति रूपी सागर में ऐसे सत्गुरू मिल गए जिनके शरीर के अंग शब्द स्वरूप हैं। उनका शरीर, प्राण और छाया कुछ भी नहीं है अर्थात् उनका पॅच भौतिक शरीर नहीं है बल्कि प्रकाश रूप और शब्द रूप है।

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, गलताना गुलजार ।
वार पार कीमत नहीं, नहीं हलका नहीं भार ।।10।।

हमें ऐसे सत्गुरू मिले हैं जो सारी सृष्टि में लीन होकर पल्लवित पुष्पों की तरह शोभा दे रहे हें। उनका कोई उरवार-पार नहीं है। उनकी कोई कीमत नहीं पा सकता और न ही उन्हें हल्का या भारी कहा जा सकता है। ऐसे शब्द स्वरूपी हैं सत्गुरू।