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।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, ऐसा सतगुरू सेईये, शब्द समाना होय।
भवसागर में डूबते, पार लंघावै सोय ।।56।।

ऐसे सत्गुरू साहिब की सेवा-उपासना करनी चाहिए जो बह्म शब्द में लीन रहता हो। ऐसे सत्गुरू ही संसार सागर में डूबते हुए प्राणी को पार लगा सकते हैं।

गरीब, ऐसा सतगुरू सेईये, सोहं सिन्धु मिलाप।
तुरिया मध्य आसन करैं, मेटंै तीन्यू ताप ।।57।।

ऐसे सत्गुरू की सेवा-उपासना करनी चाहिये जो सुरति-शब्द का मेल करा दें और तुरीया ;ज्ञान की चतुर्थ अवस्थाद्ध में पहुंचा दे। चार अवस्थाएं इस प्रकार हैं - ;जागृत, स्वप्न, गहन निद्रा और तुर्रीया जो सदैव ज्ञानमय अवस्था हैद्ध आदि दैविक, आदि भौतिक और आदिआत्म तीनों ताप मिटा दें।

गरीब, तुरिया पर पुरिया महल, पारब्रह्म का देश।
ऐसा सतगुरू सेईये, शब्द विज्ञाना नेश ।।58।।

सत्गुरू जी कहते हैं कि तुरीया से आगे पांचवीं अवस्था तुरीयातीत अवस्था है जिसमें पहुंच कर प्राणी उस पारब्रह्म के देश में पहुंच जाता है। इसे सत्गुरू जी ने पुरीय ;पूर्णद्ध अवस्था कहा है। ऐसे सत्गुरू जी की शरण लेनी चाहिए जो ब्रह्म शब्द में लीन रहता हो। ऐसे सत्गुरू की कृपा से ही प्राणी पारब्रह्म के देश में पहुॅच सकता है।

गरीब, तुरिया पर पुरिया महल, पारब्रह्म का धाम।
ऐसा सतगुरू सेईये, हंस करै निहकाम।।59।।

तुरीया से आगे तुरियातीत अवस्था में ही पारब्रह्म का धाम है। ऐसे सत्गुरू की शरण लेनी चाहिए जो प्राणी को सब इच्छाओं से रहित करके पारब्रह्म के धाम में ले जाएं।

गरीब, तुरिया पर पुरिया महल, पारब्रह्म का लोक।
ऐसा सतगुरू सेईये, हंस पठावै मोख ।।60।।

तुरीया से उपर तुरीयातीत अवस्था में ही प्राणी पारब्रह्म के लोक में जाता है। हमें ऐसे सत्गुरू की शरण लेनी चाहिए जो जीव को जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ा कर मोक्ष की पदवी हासिल करा देवे।