>

।। अथ गुरुदेव का अंग ।।

गरीब, माया का रस पीय कर, डूब गये दहूं दीन।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, ज्ञान जोग प्रवीन ।।46।।

संसार की माया का नशा पीकर दोनों ही दीनों के अनेकों प्राणी संसार सागर में डूब गए हैं। परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं जो ज्ञान और योग में पूर्णतः निपुण हैं। उनकी कृपा से हमारे उपर इस संसार की माया का कोई प्रभाव नहीं हो सकता।

गरीब, माया का रस पीय कर, गये षट् दल गारत गोर।
ऐसा सतगुरू हम मिल्या, प्रगट लिये बहोर ।।47।।

संसार की माया का नशा पीकर षट्दल ,छः भेख, भी अपने मार्ग से भटक गए हैं परन्तु हमें ऐसे सत्गुरू मिल गए हैं, जिन्होंने प्रकट होकर हमें संसार सागर में डूबने से बचा लिया है।

गरीब, सतगुरू कूं क्या दीजिये, देने को कछु नाहिं।
समन कूं साका किया, सेऊं भेंट चढाहिं ।।48।।

ऐसे सत्गुरू को हम क्या दे सकते हैं? क्योंकि हमारे पास उन्हें देने योग्य कोई वस्तु नहीं है। सत्गुरू जी के उपकार के बदले में सम्मन ने बहुत बड़ा साका कर दिया। उसने अपने इकलौते पुत्र सेउ को भी सत्गुरू की भेंट चढ़ा दिया।

गरीब, सिर साटे की भक्ति है, और कछु नही बात।
सिर के साटे पाईये, अविगत अलख अनाथ।।49।।

सत्गुरू साहिब जी की भक्ति सिर के सोदे से ही मिलती है। कोई अन्य पदार्थ उसकी कीमत नहीं है। सिर का सौदा करने से ही उस अविगत अलख पुरूष को पाया जा सकता है अर्थात् अपना अहंकार त्याग कर विनम्र उसकी भक्ति करने से ही उसे पाया जा सकता है।

गरीब, शीश तुम्हारा जायेगा, कर सतगुरू कूं दान।
मेरी मेरा छाड़ दे, यौही गोय मैदान ।।50।।

हे प्राणी! तेरा शीश एक दिन चला जाएगा। अर्थात् मौत इसे मिट्टी में मिला देगी। इसलिए तू अपना शीश सत्गुरू को दान कर दे, भाव अपना अहंकार छोड़कर सत्गुरू का सेवक बन जा। संसार के पदार्थों का ममत्व त्याग दे तभी तुझे सत्गुरू की भक्ति प्राप्त होवेगी। इस संसार रूपी मैदान में इस प्रकार की रहनी से ही जीत प्राप्त होगी।