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।। ब्रह्म वेदी ।।

अविगत आदि जुगादि योगी, सत्य पुरूष ल्यौलीन है।
गगनि मंडल गलतान गैबी, जाति अजाति बेदीन है।।21।।

ऐसा प्रभु जिसकी महिमा का कोई पार नहीं पा सकता, वह सबका आदि कारण है अर्थात् सारा संसार उस से ही उत्पन्न हुआ है। वह सतगुरू समस्त प्राणियों में समाया हुआ है। वहीं प्रभु गगन मण्डल में विराजमान है जिसकी कोई जाति और दीन नहीं है। वह प्रत्येक प्राणी में समान रूप में समाया हुआ है।

सुखसागर रतनागर निर्भय, बिन मुख बानी गावही।
बिन अकार अजोख निर्मल, दृष्टि मुष्टि नहीं आवही।।22।।

साहिब प्रभु सुख का सागर है और रत्नों की खान है। उसे किसी का भय नहीं है। बिना मुख के ही वह वाणी बोलता है। उसका न ही कोई आकार है न ही तोल-माप है। वह अति निर्मल है। वह इन आंखों से दिखाई नहीं देता और किसी की पकड़ में नहीं आता।

झिलमिल नूर जहूर जोती, कोटि पदम उजियार है।
उलटै नैंन बेसुंनि विस्तर, जहां तहां दीदार है।।23।।

साहिब प्रभु का नूर अति प्रकाशमान झिलमिल-झिलमिल कर रहा है। उसके नूर का करोड़ों पदमों जितना उजाला है। उसके दर्शन करने हेतु दोनों आंखों की पुतलियों को पलट कर जब त्रिकुटी कंवल में देखने का अभ्यास किया जाता है तो उसके नूर का समस्त जगत में दर्शन होने लगता है।

अष्ट कंवल दल सकल रमता, त्रिकुटी कंवल मध्य निरख हीं।
श्वेत धुजा शुन्य गुमट आगे, पंच रंग झंडे फरक हीं ।।24।।

साहिब प्रभु शरीर के समस्त कंवलों में समाया हुआ है। परन्तु सुरति निरत के द्वारा उसे त्रिकुटी कमल में देखा जाता है। इस सुन्न स्थान में सफेद गुम्बज के आगे पांच रंगों के झण्डे लहरा रहे हैं। इस स्थान पर ऐसे सुन्दर गुम्बज में प्रभु के दर्शन होते हैं।

शुन्य मंडल सत्य लोक चलिये, नौदर मूंद बेसुंनि है।
बिन चिश्म्यौं एक बिंब देख्या, बिन श्रवन सुनि धुंन है ।।25।।

इस काया के नौ द्वार ;गुदा द्वार, मूत्र द्वार, मुख द्वार, दो आंखें, दो कान छिद्र, दो नासिका छिद्र बन्द करके अर्थात् उन पर से ध्यान को हटाकर सुन्न मण्डल दशम द्वार अर्थात् सत्य लोक को जाते हैं। जब प्राणी ऐसा ध्यान लगाता है तो सुन्न मण्डल में बिन आंखों के निरत के द्वारा एक सुन्दर स्वरूप का दर्शन होता है। बिना कानों के सुरति से अति प्यारी धुनि सुनाई देती है।