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।। ब्रह्म वेदी ।।

गगनि मंडल की सैल कर ले, बहुरि न ऐसा दाव है।
चल हंसा परलोक पठाउं, भवसागर नहीं आव है।।16।।

उक्त लिखित धारणा में रह कर गगन मण्डल में प्रवेश करो अर्थात्, वहां के दर्शन करो। मानव जीवन अमूल्य है। इसी जीवन में यह काम हो सकता है। ऐसा अवसर फिर नहीं मिलता। इसलिए हे जीव! तू हमारे बताए हुए मार्ग पर चल। हम तुम्हें ऐसे उत्तम लोक में भेजते हैं जहां से तू जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पाकर फिर भवसागर में नहीं आएगा।

कंद्रप जीत उदीत योगी, षट करमी यौह खेल है।
अनभय मालनि हार गूंदै, सुरति निरति का मेल है।।17।।

जो साधक कामदेव को जीत लेता है वही प्रसिव योगी है। ये षट्कर्मी ;धोती, नेति, वस्ती, नौली, गजकर्मी, त्राटक योग लिया है। इस योग लिया से शरीर और मन निर्मल हो जाता है। ऐसी करनी वाले साधक का सुर्ति-निरति के द्वारा जब ध्यान स्थिर हो जाता है अर्थात् समाधि लग जाती है तो अभय मालिन ऐसी निर्मल आत्मा के गले में डालने हेतु हार गूंथती है अर्थात् उसे अभय ;जहां किसी का कोई डर नहीं पद प्राप्त हो जाता है।

सोहं जाप अथाप थरपै, त्रिकुटी संजम धुनि लगै।
मानसरोवर न्हान हंसा, गंग सहंस मुख जित बगै।।18।।

सोहं मंत्र का जाप जब श्वास से किया जाता है, उसे अजपा जाप कहा जाता है। साधक हृदय में अजपा जाप धारण करे और संयम पूर्वक त्रिकुटी कंवल में ध्यान लगाए। ऐसा ध्यान करने से उस स्थान पर मान सरोवर रूपी गंगा में स्नान हो जाता है जो हज़ारों धाराओं में यहां बह रही है।

कालंद्री कुरबान कादर, अविगत मूरति खूब है।
छत्र श्वेत विशाल लोयन, गलताना महबूब है।।19।।

कलंदरी, जो ज्ञान भक्ति रूपी गंगा त्रिकुटी कंवल में है, उस कादिर का ही रूप है। उसकी गति कोई नहीं पा सकता। वह अति सुन्दर मूरत है। हम उस पर से बलिहार जाते हैं। उस सुन्दर मूरत प्रभु के शीश पर सफेद छत्र है और उसके बहुत सुन्दर नेत्र हैं। वह सबका प्रीतम अपनी मस्ती में उस स्थान पर विराजमान है।

दिल अंदर दीदार दर्शन, बाहिर अंत न जाईये।
काया माया कहां बपरी, तन मन शीश चढ़ाईये।।20।।

सतगुरू जी कहते हैं कि ऐसे प्रीतम प्रभु का दीदार-दर्शन अपने दिल के अन्दर ही होता है। उसे कहीं बाहर ढूंढने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे प्रीतम प्रभु के दर्शन करने के लिए यह शरीर और संसार की माया मामूली चीज़ है। उसे अपना शीश देकर भी दीदार हो जाए तो सस्ता ही है। ऐसे प्रभु को पाने हेतु अपना तन-मन-धन उसे अर्पण कर दें।