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।। ब्रह्म वेदी ।।

शब्द निवास अकाश वाणी, यौह सतगुरू का रूप है।
चन्द सूर नहीं पवन पानी, ना जहां छाया धूप है ।।51।।

ऐसे सतगुरू देव जी का शब्द स्वरूप रूप हैं और समस्त जगह मौजूद वाणी है अर्थात् शब्द करके समस्त संसार में वही बोल रहे हैं। ऐसे शब्द निवासी अविगत पुरूष के सुन्न मण्डल में न चंद्रमा है, न सूर्य है, न ही हवा और पानी है, न ही वहां छाया या धूप हैं अर्थात् संसार के सुख-दुख गर्मी-सदी आदि कुछ भी नहीं है।

रहता रमता राम साहिब, अविगत अलह अलेख है।
भूले पंथ विटंब वादी, कुल का खाविंद एक है ।।52।।

ऐसा शब्द रूप पारब्रह्म अविगत पुरूष सारी सृष्टि में रमा हुआ राम है। संसार में अनेक मतवादी सम्प्रदाय के लोग भूले हुए हैं जो अपने-अपने मतानुसार उस साहिब प्रभु को अलग-अलग करके मानते हैं, जबकि समस्त सृष्टि का स्वामी कुल मालिक एक है।

रूंम रूंम मे जाप जप ले, अष्ट कंवल दल मेल है।
सुरति निरति कूं कंवल पठवौ, जहां दीपक बिन तेल है ।।53।।

सतगुरू जी उपदेश करते हैं कि ऐसा सबका एक मालिक जो तुम्हारे शरीर के समस्त कमलों में समाया हुआ है ऐसे प्रभु का नाम रोम-रोम में जाप कर अर्थात् नाभि में परावाणी की धुन से प्रभु के नाम का जाप कर। अपनी सुरति-निरत को नाम से जोड़कर त्रिकुटी कमल में स्थिर कर जहाू बिन तेल, बाती के प्रभु की ज्योति का दीपक जल रहा है।

हरदम खोज हनोज हाजिर, त्रिवैणी के तीर हैं।
दास गरीब तबीब सतगुरू, बंदीछोड़ कबीर हैं ।।54।।

सतगुरू गरीब दास महाराज जी कहते हैं कि हे हंस! ऐसे प्रभु की प्रत्येक श्वास से खोज कर। वह तुम्हारे त्रिकुटी कमल में हाज़िर नाज़िर विराजमान है। ऐसे तबीब सतगुरू साहिब बन्दी छोड़ ;जन्म-मरण का बन्धन काटने वाले कबीर साहिब हैं। ऐसे सतगुरू जी का प्रत्येक श्वास से सुमिरन कर।