|| अथ सुमिरन का अंग ||                                                 

सुमिरन का अर्थ है स्मरण करना, याद करना | दूसरे शब्दों में इसे प्रभु का नाम लेना भी कह सकते हैं |

इस अंग में बाबा गरीब दास जी ने विस्तार पूर्वक सुमिरन का सही तरीका बताया है | जिस का सुमिरन करना है उस परमेश्वर का स्वरुप, उस का नाम और उस नाम को जपने की विधि, सुमिरन का महत्त्व, नाम की महिमा, भगतों की प्रशंसा, परमेश्वर के निर्गुण और सर्गुण स्वरुप का ज्ञान, इ. विषयों का पूरा वर्णन किया है |

सब से पहले परमेश्वर के स्वरुप का वर्णन किया गया है| क्योंकि जिस का स्मरण करना है अगर उसके वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हि ना हो तो बात नहीं बनती| इसलिए सर्व प्रथम परमेश्वर के सर्व व्यापक स्वरुप को समझाया है|

गरीब ऐसा अविगत राम है, आदि अंत नहीं कोय | वार पार कीमत नहीं, अचल हिरम्बर सोय ||१||

गरीब ऐसा अविगत राम है, अगम अगोचर नूर | सुनं सनेही आदि है, सकल लोक भरपूर ||२||

गरीब ऐसा अविगत राम है, गुण इंद्रिय से न्यार | सुनं सनेही रमि रह्या, दिल अंदर दीदार ||३||

गरीब ऐसा अविगत राम है, अपरम पार अल्लाह | कादर कूं कुरबान है, वार पार नहीं थाह ||४||

गरीब ऐसा अविगत राम है, कादर आप करीम | मीरा मालिक मेहरबान रमता राम रहीम ||५||

अविगत = जिसे जाना ना जा सके|  जिसका कभी नाश ना हो | जो व्यतीत न हुआ हो | जिसका वर्णन न किया जा सके | 

अचल = सदा एक सा बना रहने वाला।

हिरम्बर = स्वर्ण के समान शुद्ध, प्रकाशवान|

अगम =  जिसमें प्रवेश न किया जा | समझ से परे हो | जिसके पार न जाया जा सके|

अगोचर = जो इंद्रियों से परे हो या जिसका ज्ञान या अनुभव इंद्रियों से न हो सके

अपरमपार = बहुत अधिक। बेहद। असीम। जिसका पारावार न हो।

करीम = दानी| दान देने वाला |

रहीम = करुणावान् तथा दयालु।

बाबा गरीबदास जी परमेश्वर को राम का नाम देकर उस राम के स्वरुप का वर्णन करते हुए कहते हैं की किसी के भी द्वारा ना जाना जा सकने वाला राम ऐसा है की ना उसका कोई आदि है, ना हि उसका कोई अंत है|(अर्थात उसका ना जन्म होता है ना हि मृत्यु ) उसके इस सिरे या उस सिरे (पार) का कोई पता नहीं (उसके विस्तार को कोई नहीं जनता)| वह अनमोल है, कीमत से रहित है| वह सदा चमकते हुए स्वर्ण के समान एक सी स्थिति में बना रहता है | ||१||

कभी भी नाश ना होने वाला राम ऐसा है की उसके नूर को (अस्तित्व को) इन्द्रियों के द्वारा नहीं देखा जा सकता| वह सुन्न अर्थात शांति स्वरुप, स्नेही सब के शुरू से हि है और सब जगह व्याप्त है | ||२||

वर्णन ना किया जा सकने वाला वह राम ऐसा है की वह गुणों से रहित है,  उसे इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता| वह शांति स्वरुप, परम स्नेही हर जगह रम रहा है, और उसके अपने दिल में हि दर्शन होते हैं| ||३||

वह अनश्वर राम ऐसा है की उस की कोई सीमा नहीं असीम है | उस परमेश्वर पर मैं कुरबान जाता हूँ | उस के  इस पार, उस पार या गहराई का कोई पता नहीं | ||४||

वह अज्ञेय राम महा दानी है| वह मीरा का मालिक मेहरबान है, सब जगह रमण करने वाला और बहुत दयावान है | ||५||

 

[संक्षिप्त में - परमेश्वर नाश रहित है | वह ना हि कभी उत्पन्न हुआ और ना हि कभी मृत्यु को प्राप्त होता है| वह सदा था सदा है और सदा रहेगा| उस की व्यापकता का हम अनुमान नहीं लगा सकते| वह सदा एक सी स्थिति में रहता है | अपनी बुद्धि से हम उसे समझ नहीं सकते, अपनी इन्द्रियों से हम उसे जान नहीं सकते| वह शांत और स्नेही सब जगह रम रहा है| उसे अपने दिल में हि पाया जा सकता है| वह असीम दानवीर, रहम करने वाला हमारा सच्चा मालिक है |]

 

गरीब अलह अविगत राम है, बेचगून्न चित्त माहिं | शब्द अतीत अगाध है, निर्गुण सरगुन नाहिं ||६||

गरीब अलह अविगत राम है, बेचगून्न निरबान | मौले मालिक है सही, महल मढ़ी नहीं थान ||७||

गरीब अलह अविगत राम है, निराधार आधार | नाम निरंतर लीजिये, रोम रोम की लार ||८||

गरीब अलह अविगत राम है, निरबानी निरबंध | नाम निरंतर लीजिये, ध्यान चकोरा चन्द ||९||

गरीब अलह अविगत राम है, कीमत कही न जाय | नाम निरंतर लीजिये, मुख से कहि न सुनाय ||१०||

गरीब अलह अविगत राम है, निरबानी निरबंध | नाम निरंतर लीजिये, ज्यूँ हिल मिल मीन समंद ||११||

अलह = दुर्लभ या बहुमूल्य।

बेचगुन्न = ?

अगाध = जिसकी सीमा न हो /

निराधार = जिसका कोई आधार (आवलंब या आश्रय) न हो।  निर्मूल।

निरबंध = बंधन से रहित |

निरबानी = निर्वाण या मुक्ति को देने वाला |

 

वह राम बहुमूल्य है, उसका कभी विनाश नहीं होना वाला है | वह बेचगुन्न सभी के चित्त में वास करता है | वह परमेश्वर शब्द के भी पहले से है, उस की कोई सीमा नहीं| उसे ना निर्गुण कह सकते हैं ना सर्गुण हि कह सकते हैं | ||६||

(शास्त्रों के अनुसार सारी सृष्टि, ब्रह्माण्ड इ. ओम शब्द कि ध्वनि के साथ उत्पन्न हुए हैं| महाराज जी संध्या आरती में लिखते है |

       हम है शब्द शब्द हम माही , हम से भिन्न और कुछ नहीं || ६ ||

अर्थात परमेश्वर से हि शब्द की उत्पत्ति हुई, और जो शब्द उत्पन्न हुआ वह भी परमेश्वर स्वरुप हि है| शब्द की उत्पत्ति से पहले, उत्पत्ति के समय और उत्पन्न हुआ शब्द इन सभी अवस्थाओं में परमेश्वर विद्यमान है| उससे भिन्न और कुछ भी नहीं | इसी तरह निर्गुण और सगुन के बारे में कहा है, की परमेश्वर को ना निर्गुण कह सकते है ना हि सर्गुण| महाराज जी बाणी में एक जगह कहते है की

निर्गुण कहूं तो गुण किन किने, सर्गुण कहूं तो हानि |

अगर परमेश्वर को निर्गुण मान लिया जाये तो फिर उस में से सभी गुण कैसे उत्पन्न हो सकते हैं| और अगर उसे गुणों से युक्त माना जाये तो हानि है क्योंकि कोई भी परमेश्वर के गुणों को नहीं जान सकता | निर्गुण सर्गुण पर इसी अंग में आगे और बताया गया है |)

वह राम अनश्वर, बहुमूल्य है| वह बेचगुन्न है, मुक्ति का दाता है, और वही हमारा वास्तविक परमेश्वर, मालिक है | ना वह महल में है,  ना किसी मढ़ी में, और ना हि किसी थान में | ||७||

वह राम नाश रहित, बहुमूल्य है| बिना किसी के आश्रय के है, अर्थात अपना वजूद कायम रखने के लिए उसे किसी का आश्रय लेने की जरूरत नहीं बल्कि सारा विश्व उसी में आश्रित है(दूसरे शब्दों में वह निराश्रितों का आधार है |)| ऐसे  प्रभु का नाम लगातार लेते रहना चाहिए ताकि वह रोम रोम में लीन हो जाये ||८||

वह राम बहुमूल्य है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता| वह सब बंधनों को काटकर मुक्ति प्रदान करने वाला है | उसका नाम हमेशा ऐसे लेना चाहिए जैसे चकोर पक्षी चन्द्रमा में अपना ध्यान लगाये रहता है| ||९||

वह राम अज्ञेय और दुर्लभ है| उस की कीमत कोई नहीं जान सकता| उसका नाम मुख से बिना कुछ बोले और बिना कुछ सुने निरंतर लेते रहना चाहिए| अर्थात मन से सुमिरन करना चाहिए |||१०||

वह राम अनश्वर, बहुमूल्य है| बंधनों को काटकर मुक्ति प्रदान करने वाला है | जिस तरह मछली समुद्र के जल के बिना एक पल भी जीवित नहीं रहती उसी तरह परमेश्वर के प्रति इतना प्रेम होना चाहिए की उस के नाम के बिना आप की स्थिति वैसी हि हो जैसी मछली की पानी के बिना | ||११||

गरीब दोऊ दीन मध्य एक है, अलह अलेख पिछान | नाम निरंतर लीजिये, भक्ति हेत उर आन ||१२||

चाहे कोई हिंदू हो या मुस्लमान दोनों में एक हि बहुमूल्य, अगम्य परमेश्वर का वास है, उसी की पहचान हमें करनी चाहिए| अपने हृदय में भक्ति को उत्पन्न करने के लिए उसका नाम निरंतर लेना चाहिए| ||१२||

गरीब अष्ट कमल दल राम है, बाहिर भीतर राम | पिंड ब्रह्मंड में राम है, सकल ठौर सब ठाम ||१३||

गरीब सकल व्यापी सुन्नि में, मन पवना गहि राख | रोम रोम धुन होत है, सतगुरु बोलै साख ||१४||

गरीब मूल कमल में राम है, स्वाद चक्र में राम | नाभि कमल में राम है, हृदय कमल विश्राम ||१५||

गरीब कंठ कमल में राम है, त्रिकुटी कमल में राम | सहंस कमल में राम है, सुन्नि बसती सब ठाम ||१६||

गरीब अचल अभंगी राम है गलताना दम लीन | सुरति निरति के अंतरै, बाजै अनहद बीन ||१७||

अभंगी = जो किसी प्रकार भंग न हो सके|

गलताना = सब जगह रमा  हुआ |

अनहद = जिसकी उत्पत्ति आघात से न हुई हो।

हमारे शारीर के आठों कमलों में राम है, बाहर की सारी सृष्टि में, हमारे भीतर और बाहर भी राम हि बसा है| जैसे हमारे शारीर (पिंड) में राम बासा है उसी तरह ब्रह्माण्ड में भी राम हि बसा हुआ है| सभी जगह राम हि बसा हुआ है| ||१३||

अपने मन, पवन को सभी जगह व्याप्त अदृश्य परमेश्वर में लगा कर रखो| सर्व व्यापक परमेश्वर की धुन छोटे से छोटे कण में भी मौजूद है, इस बात की सतगुरु ग्वाही देते हैं| ||१४||

मूल कमल, स्वाद चक्र, नाभि कमल इन सभी में राम हि मौजूद है| हृदय कमाल में उसीका निवास है| ||१५||

इसी तरह कंठ कमल, त्रिकुटी कमल और सहंस कमल में राम का हि वास है| चाहे सुना स्थान हो या बसती सब जगह राम का हि वास है| ||१६||

वह राम सदा एक सी स्थिति में बना रहता है| उसे अलग नहीं किया जा सकता, या बांटा नहीं जा सकता | वह सब जगह रम रहा है और सब के श्वासों में वही समाया हुआ है| सुरति और निरति में वही है या सुरति और निरति के मध्य उस की अनहद ध्वनि सुनाई देती है| ||१७||


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