अथ संध्या आरती

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सदगुरु श्री कबीर साहिब जी महाराज द्वारा रचित ८ आरतियाँ

                                                               

         पहली आरती हरि दरबारे, तेज पुंज जहाँ प्राण उधारें || १ ||

         पाती पंच पौहप कर पूजा, देव निरंजन और न दूजा || २ ||

         खण्ड खण्ड में आरती गाजै, सकल मयी हरि जोत विराजै || ३ ||

         शांति सरोवर मज्जन कीजै, जत की धोती तन पर लीजै || ४ ||

         ग्यान अंगोछा मैल न राखै, धर्म जनेऊ सत् मुख भाखे || ५ ||

         दया भाव तिल मस्तक दीजै, प्रेम भक्ति का अचमन लीजै || ६ ||

         जो नर ऐसी कार कमावै, कंठी माला सहज समावै || ७ ||

         गायत्रि सो जो गिनती खोवै, तर्पण सो जो तमक न होवे || ८ ||

         संध्या सो जो संधि पिछाने, मन पसरे कुं घर में आने || ९ ||

         सो संध्या हमरे मन मानी, कहै कबीर सुनो रे ज्ञानी || १० ||

 

अर्थ : सब से पहले मैं परमेश्वर के दरवार में आरती करता हूं | जहाँ पर वह प्रकाश स्वरुप परमेश्वर, सब प्राणियों का उद्धार करता है |

उस परमेश्वर की पुजा अपनी पांचों इन्द्रियों (जो की किसी फुल के पांच पत्तों के समान हैं) का फुल बना कर करो | अर्थात तुं अपनी बहिर मुखी पांचों इन्द्रियों को पुष्प के समान केंद्रित करके उस एक परमेश्वर की पुजा कर | संसार से अपनी इन्द्रियों को हटा कर परमेश्वर की पुजा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध से कर | वह परमेश्वर माया से रहित है, उस के सिवा दूसरा कोई नहीं |

हर एक कण में उस परमेश्वर की आरती गूंज रही है, सभी में हरि (परमात्मा) की ज्योत विराजमान है |

उस परमेश्वर की आरती करने के लिए तुं अपने मन को एकाग्र करके शांति के सरोवर में स्नान कर | जिस प्रकार धोती को अपने तन पर धारण करता है उसी प्रकार तुं संयम को धारण कर |

जिस प्रकार तुं तोलिये से अपने शरीर की मैल साफ करता है उसी तरह ज्ञान से अपने मन की मैल को दूर कर | तेरे धर्म का प्रतिक यह जनेऊ नहीं बल्कि सच्च बोलना ही तेरा धर्म है तुं इसी जनेऊ को धारण कर |

दया की भावना का तुं अपने माथे पर तिलक लगा अर्थात दया भाव को अपनी बुद्धि में हमेशा बनाये रख | और सब से प्रेम करता हुआ प्रेम भगति का पान कर |

जो मनुष्य ऐसे नियमों का पालन करता है उसका अपने आप ही सिमरन चल पडता है उसे लोक दिखावे के लिए गले में माला नहीं डालनी पडती | अर्थात वह सहज भाव से ही हर श्वास के साथ परमेश्वर का स्मरण करता रहता है |

जो श्वास श्वास के साथ नाम स्मरण करे, जिसका अजपा जाप चल पडे, जो हर समय अपने मूल स्वरुप में खोया रहे उसे गिनती के हिसाब से माला या गायत्री जप करने की जरुरत नहीं, वह तो हमेशा ही गायत्री जाप करता रहता है |

जिसके अंदर का अंधकार मिट गया समझो वह संतुष्ट हुआ, उसका तर्पण हो गया |

 

वास्तव में संध्या तो वही है जिसमे साधक जिव और ब्रह्म की एकता को पहचानता है और बाह्य पदार्थों में फैले हुए मन को समेट कर, अपने भीतर(घर) में स्थित परमेश्वर में लगा देता है | यही सच्ची संध्या आरती पुजा है |

सदगुरु कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की हे विचारवान जिज्ञासुओ सुनो यही संध्या हमारे मन को अच्छी लगती है |

                                                  

ऐसी आरती त्रिभुवन तारे, तेज पुंज जहाँ प्राण उधारे || १ ||

पाती पंच पौहप कर पूजा, देव निरंजन और न दूजा || २ ||

अनहद नाद पिण्ड ब्रेह्मंडा , बाजत अह निस सदा अखंडा || ३ ||

गगन थाल जहाँ उडगन मोती, चंद सुर जहाँ निर्मल जोती || ४ ||

तन मन धन सब अर्पण कीन्हा, परम पुरुष जिन आत्म चीन्हा || ५ ||

            प्रेम प्रकाश भरा उजियारा, कहै कबीर में दास तुम्हरा || ६ ||

महाराज कबीर साहिब  जी कहते हैं की इस तरह की आरती तीनों लोकों को तारने वाली है | वह प्रकाश स्वरुप परमेश्वर, सब प्राणियों का उद्धार करता है |

उस परमेश्वर की पुजा अपनी पांचों इन्द्रियों (जो की किसी फुल के पांच पत्तों के समान हैं) का फुल बना कर करो | वह परमेश्वर माया से रहित है, उस के सिवा दूसरा कोई नहीं |

उस सत पुरुष की आरती में बिना किसी के बजाए ही एक शब्द इस शरीर और पुरे ब्रह्माण्ड में दीन रात लगातार, बिना रुके बज रहा है |

उस सत पुरुष की आरती में आकाश आरती की थाली के समान है और तारागन उस थाली में रखे मोतियों के समान हैं और इस आरती की थाली में रखे दीपक के समान चंद्र और सूर्य की निर्मल ज्योति जगमगा रही है |

ऐसे परमपिता परमेश्वर के प्रति जिन्होंने अपना तन, मन, धन, अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है, जिन्होंने उस परमपिता को अपनी आत्मा में बसाया है, अपनी आत्मा में उसका साक्षात्कार किया है, जिन महापुरषों के ह्रदय में प्रेम भाव उत्पन्न हुआ है, कबीर जी कहते हैं की ऐसे महापुरषों का मैं दास हूं |

                                               

संध्या आरती करो विचारी   , कल दूत जम रहे झख मारी      || १ ||

लाग्या सुषमन कुंची तारा    , अनहद शब्द उठै झनकारा       || २ ||

उनमनी संजम अगम घर जाई , अछे कमल में रहया समाई     || ३ ||

त्रिकुटी संजम कर ले दरसन , देखत निरखत मन होय परसन    || ४ ||

प्रेम मगन होय आरती गावैं , कहै कबीर भौजल बहुर न आवै   || ५ ||

इस आरती को जो भी कोई विचार पूर्वक करता है | अर्थात परमेश्वर के सच्चे स्वरुप का विचार करता है या ध्यान करता है उस के पास यमराज के दूत फटक भी नहीं सकते वह व्यर्थ ही धक्के खाते रहते हैं |

जो अपने मन को साफ करता है, उसे सूक्ष्म से सूक्ष्म करता है, अर्थात मन को परमेश्वर में लगाकर उसे पाने (जानने) की प्रकिर्या में मन की सारी सांसारिक मैल उतर कर मन को हलका (सूक्ष्म) करता है, वह अपने इस सूक्ष्म मन की चाबी से उस ताले को खोल देता है जिस के खुलते ही अनहद (बिना आहत के) शब्द की झनकार सुनाई देने लगती है | अर्थात ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जहां उसे परमेश्वर का एहसास होने लगता है |(अपने श्वासों को रोक कर पवन को सुष्मना नाडी में प्रवेश करवाओ जिससे अनहद शब्द की झनकार सुनाई देने लगे |) 

जब उसका बहिर्मन शुद्ध हो जाता है तो इस के प्रभाव से उसका अंतर्मन भी शुद्ध हो जाता है , फिर अंतर्मन और बहिर्मन दोनों एक होकर एक दिव्य मन में रूपांतरित हो जाते हैं , और साधक का मन परमेश्वर में लगा रहता है |  इस अवस्था को उनमन अवस्था कहते हैं | जो इस अवस्था में लगातार बना रहता है (जिस का मन लगातार परमेश्वर की तरफ रहता है |) वह ऐसे स्थान में प्रवेश कर जाता है जहाँ पर किसी की गम्यता नहीं अर्थात मुक्ति पद में प्रवेश कर जाता है | ऐसा महापुरुष अक्षय कमाल (जिसका कभी नाश न हो ) अर्थात परमात्म तत्व में लीन रहता है |

त्रिकुटी पर ध्यान लगाकर तुं उस परमात्म स्वरुप के दर्शन कर, उसे देखने से, उसको निहारने से मन अति प्रसन्न होता है |

महाराज कबीर साहिब जी कहते हैं जो उस परमेश्वर के प्रेम में लीन हो कर आरती गाते हैं, वह इस संसार सागर में फिर नहीं आते वह मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं |

                                                                                                

हरि दर्जी का मर्म न पाया   , जिन योह चोला अजब बनाया     || १ ||

पानी की सुई पवन का धागा , नौ दस मास सिवते लागा        || २ ||

पांच तत् की गुदरी बनाई    , चंद सूरज दो थिगरी लगाई       || ३ ||

कोटि जतन कर मुकुट बनाया , बिच बिच हिरा लाल लगाया     || ४ ||

आपे सिवे आप बनावे       , प्रान पुरुष कुं ले पहरावे          || ५ ||

कहे कबीर सोई जन मेरा    , नीर खीर का करे निवेरा         || ६ ||

 

कबीर साहिब जी महाराज परमेश्वर को दर्जी की उपमा देते हुए कहते हैं की जिस परमेश्वर ने इस अजब शरीर को बनाया, उस परमेश्वर रूपी दर्जी का भेद कोई नहीं जान पाया |

इस शरीर को बनाने के लिए परमेश्वर ने पानी की सुई और पवन को धागा बनाया और उसे इस शरीर को सिलने में ९-१० महीने लगे |

उसने इस शरीर रूपी गुदरी को पांच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ) से बनाया है | फिर इस शरीर में चंद्र और सूर्य के समान दो चमकते हुए नेत्र लगाए | करोडों ही उपाय करके इस शरीर रूपी गुदड़ी के मस्तक (मुकुट) को बनाया और उसके बिच बिच में लाल हीरे के समान सुन्दर नाक, कान, दन्त और नेत्र लगाए |

वह परमपिता परमेश्वर हरि नामक दर्जी खुद ही इस शरीर रूपी चोले को सीता है, खुद ही इस को पूर्ण रूप से बनाकर तयार करता है और खुद ही लेजाकर प्राण पुरुष को पहना देता है |

कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की वही भक्त मेरा अपना है जो दूध और पानी को अलग-अलग कर दे | अर्थात जो आत्मा और शरीर को अलग जानकर परम तत्व को प्राप्त कर ले वही मेरा सच्चा भक्त है |

                                   

राम निरंजन आरती तेरी    , अवगति गति        |

कहुक समझ पडे नहीं       , क्यों पहुंचे मति मेरी  || १ ||

निराकार निरलेप निरंजन    , गुण अतीत तिहुं देवा  |

ग्यान ध्यान से रहे निराला  , जानी जाय न सेवा    || २ ||

            सनक सनन्दन नारद मुनिजन, शेष पार नहीं पावै    |

            शंकर ध्यान धरे निस वासर , अजई ताहि झुलावें    || ३ ||

            सब सुमिरै अपने अनुमाना   , तो गति लखी न जाई |

            कहैं कबीर कृपा कर जन पर , ज्यो है त्यों समझाई  || ४ ||

 

हे निर्दोष, अदृशय, विषय रहित, माया रहित, शुद्ध राम मैं आपकी आरती कैसे करूँ | प्रभु आपकी गति को मैं समझ नहीं सकता, मेरी बुद्धि आपतक नहीं पहुंच सकती |

आप आकार से रहित हो, किसी भी विषय वस्तु से निर्लिप्त हो, माया से रहित हो, तीनों गुणों से अलग हो, और तीनों देवों से भी आप अलग हो | आप को न ग्यान से, न ध्यान से पाया जा सकता है क्यों की आप इन से भी अलग हो, न ही मैं यह जनता हूं की मैं आप की सेवा किस प्रकार करूं |

आप के स्वरुप को सनक, सनंदन, (तथा सनातन और संतकुमार) नारद, मननशील लोक, और शेषनाग भी नहीं जान सके | शंकर भगवान दीन रात आपका ध्यान करते हैं और अब तक उसी अवस्था में झूल रहें हैं लेकिन आप के स्वरुप को नहीं  जान सके |

कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की हे परमपिता परमेश्वर ! सभी अपने अपने अनुमान के अनुसार आप का स्मरण करते हैं लेकिन आप की महिमा को पूर्ण रूप से कोई नहीं समझ सका | हे प्रभु अपने दास जनों पार कृपा करो और आप अपने बारे में खुद ही हमें समझाओ |

                                   

            नूर की आरती नूर क छाजै , नूर के ताल पखावज वाजे || १ ||

            नूर के गायन नूर कुं गावै  , नूर सुनन्ते बहुर न आवै   || २ ||

            नूर की बानी बोले नूर     , झिलमिल नूर रहया भरपूर || ३ ||

            नूर कबीरा नूर ही भावै    , नूर के कहै परम पद पावै  || ४ ||

 

ईश्वरीय नूर की आरती को खुद ईश्वरीय नूर सजा रहा है | ईश्वरीय नूर की ताल पर ढोलक और बाजे बज रहे हैं | ईश्वरीय नूर के गायक गाकर ईश्वरीय नूर का बखान कर रहे हैं, जो इस ईश्वरीय नूर के गीत को सुन लेता है वह फिर इस संसार में वापस नहीं आता, अर्थात उस का मन संसार में नहीं लगता | ईश्वरीय नूर की बानी ईश्वरीय नूर का बखान कर रही है, सब तरफ जगमगाता हुआ ईश्वरीय नूर व्यापत है |

कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की ईश्वरीय नूर को खुद के जैसा ईश्वरीय नूर से भरा हुआ जीवात्मा ही अच्छा लगता है | उस नूर को कहने से ही परम पद की प्राप्ति होती है |

 

                       

तेज की आरती तेज के आगे , तेज का भोग तेज कूं लागे || १ ||

तेज पखावज तेज बजावै  , तेज ही नाचै तेज ही गावे  || २ ||

तेज का थाल तेज की बाती , तेज का पुष्प तेज की पाती || ३ ||

तेज के आगे तेज बिराजे    , तेज कबीरा आरती साजै   || ४ ||

 

परमेश्वरीय तेज के द्वारा तेज स्वरूप परमेश्वर के आगे आरती हो रही है | परमेश्वरीय तेज का भोग तेज रूपी परमेश्वर को लग रहा है | तेज रूपी ढोलक है और उसे तेज रूप परमेश्वर बजा रहा है, तेज स्वरुप परमेश्वर नाच रहा है और तेज रूपी परमेश्वर गा रहा है |

परमेश्वरीय तेज आरती का बना है, तेज की ही बाती है, परमेश्वरीय तेज के पुष्प हैं और उसी तेज की पत्तियां हैं |

महाराज कबीर साहिब कहते हैं की तेज स्वरुप परमेश्वर के आगे खुद तेज स्वरुप विराजमान है और वह खुद ही आरती बान कर सज रहा है |

                       

आपै आरती आपै साजै, आपै किंगर आपै बाजै     || १ ||

आपै ताल झांझ झनकारा, आप नचै अप देखन हारा || २ ||

आपै दीपक आपै बाती, आपै पुष्प आप ही पाती    || ३ ||

कहै कबीर ऐसी आरती गाऊं, आपा मधे आप समाऊ || ४ ||

 

वह परम पिता परमेश्वर खुद ही आरती बना हुआ है, खुद ही आरती को सजा रहा है, खुद ही वाद्य यंत्र बना हुआ है, और खुद ही उन्हें बजा रहा है |

वह परम पिता परमेश्वर खुद ही ताल है, खुद ही झाँझ होकर झनकार कर रहा है, इस झनकार पर वह खुद ही नाच रहा है अपने इस नाच को खुद ही देख रहा है |

वह परम पिता परमेश्वर खुद ही दीपक बना है, खुद ही उस दीपक की बाती| वह खुद ही फुल और पत्र बना हुआ है |

कबीर साहिब जी महाराज कहते हैं की मैं एसी आरती गाता हू जिससे की मैं अपने निज स्वरूप, शुद्ध ब्रह्म में समा जाऊँ |

 

              

              

(सतगुरु श्री गरीबदास जी महाराज द्वारा रचित ८ आरतियाँ )

                                   

अदली आरती अदल समोई , निरभै पद में मिलना होई      || १ ||

दिल का दीप पवन की बाती , चित्त का चन्दन पाँचों पाती    || २ ||

तत् का तिलक ध्यान की धोती , मन की माला अजपा जोती || ३ ||

नूर के दीप नूर के चौरा , नूर के पुष्प नूर के भौरा         || ४ ||

नूर की झांझ नूर की झालर , नूर के संख नूर टालर        || ५ ||

नूर की सेज नूर की सेवा , नूर के सेवक नूर के देवा       || ६ ||

आदि पुरुष अदली अनुरागी , सुन्न सम्पट में सेवा लागी     || ७ ||

खोजो कमल सुरति की डोरी , अगर दीप में खेलो होरी      || ८ ||

निरभै पद में निरति समानी , दास गरीब दरस दरबानी      || ९ ||

 

शब्द अर्थ : अदली यह एक अरबी भाषा के शब्द अदलह का रूपांतरण है जिस का मतलब है न्यायकर्ता,  न्यायप्रिय, परमेश्वर का न्याय |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की जो साधक न्यायकर्ता परमेश्वर की आरती नियम से प्रेमपूर्वक मगन हो कर करता है वह अदल तत्व अर्थात परमात्म तत्व मे लीन हो कर निर्भय पद को प्राप्त करता है |

जिस प्रकार हम भगवान की मूर्ति  की आरती करने के लिए थाली मे दीपक रखकर उस मे रुई की बाती लगाते हैं | साथ में चन्दन, फूल की पत्तियाँ ले लेते हैं, भगवान को तिलक लगाने के लिए कुमकुम लेते हैं | इसी तरह आत्मदेव की आरती के लिए दिल को दीपक बनाकर उस मे प्राणों की बाती लगाकर अपने अंदर प्रकाश कर, मन को परमेश्वर चिन्तन में चन्दन की तरह घिसा, अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को परमेश्वर को अर्पण कर, परमेश्वरीय ज्ञान का जो सार तत्व है उससे तुं अपनी बुद्धि को तिलक दे अर्थात बुद्धि को सार तत्व में लगा | जैसे कोई हमेशा अपने शरीर पर वस्त्र धारण किये रहता है उसीतरह तुं हमेशा उसी सार तत्व का ध्यान कर | जिस प्रकार कोई माला फेरता है उसी तरह अपने मन में बारम्बार परमेश्वर का स्मरण कर और अपने अंदर ज्योत को जगाओ |

परमेश्वर की आरती में ज्योति स्वरुप प्रकाश (नूर) के दीपक है, नूर की चंवर है, नूर के फुल हैं और वही नूर भवरा भी बना हुआ है | ज्योति स्वरुप प्रकाश (नूर) की झांझ है, उसी की झालरें लगी हैं | परमेश्वरीय नूर के शंख बज रहे हैं और उसी नूर की टाल बज रही है | ज्योति स्वरुप प्रकाश (नूर) की सेज बनी है, वह नूर ही सेवा बना हुआ है, नूर के सेवक हैं और सेवा करवाने वाला खुद भी नूर ही है |

वह आदि पुरुष, न्यायकर्ता, परमस्नेहि, प्रियतम शुन्य संपट में स्थित है | उस परमेश्वर के स्थान अक्षय कमल को ध्यान (सुरति) के द्वारा खोजो| उस अगर द्वीप में आनंद की होली खेलो  और निरंतर निर्भय पद में तल्लीन हो कर उस दरबानी अर्थात परमेश्वर के दर्शन करो |

 

                    

            अदली आरती अदल उचारा , सत पुरुष दीजो दीदारा     || १ ||

            कैसे कर छुटे चौरासी , जुनी संकट बहुत तिरासी        || २ ||

            जुगन जुगन हम कहते आए , भौसागर से जीव छुडाये   || ३ ||

            कर विश्वास स्वांस कूं पेखो , या तन मे मन मूर्ति देखो  || ४ ||

            स्वसा पारस भेद हमारा , जो खोजै सो उतरे पारा       || ५ ||

            स्वसा पारस आदि निसानी , जो खोजै सो होए दरबानी  || ६ ||

            हरदम नाम सुहंगम सोई , आवागमन बहुर नहीं होई    || ७ ||

            अब तो चडौ नाम के छाजे , गगन मंडल में नौबत बाजे || ८ ||

            अगर अलील शब्द सह्दानी , दास गरीब विहंगम बानी   || ९ ||

न्यायप्रिय परमेश्वर की आरती हमेशा उस न्याय प्रिय परमेश्वर का उच्चारण करने मे ही है | हे सत पुरुष कृपा आप हमें दर्शन दें |

हे प्रभु हम चौरासी लख योनियों से कैसे मुक्त हो सकते हैं, क्योंकि यह जन्म मरण का चक्कर बहुत दुःख देने वाला है |

हम कई युगों से कहते आ रहे हैं और भवसागर से जीवों को छुडाया है | हमारे  उपर विश्वास करो और अपने श्वासों के आने जाने की प्रकिर्या को देखो जिससे तुम्हे इस शरीर में ही आत्म साक्षात्कार हो |

यह हमारे श्वास किसी पारस के समान  बहुमूल्य हैं और इसी में हमारा भेद है| जो इस भेद को जान लेता है वह भवसागर से पार उतर जाता है | यह हमारे श्वास किसी पारस के समान  बहुमूल्य हैं और इसी में परमेश्वर की मूल निशानी है| जो इस निशानी को पहचान लेता है वह परमेश्वर के दरबार में स्थित हो जाता है |

जो हर श्वास के साथ नाम लेता हुआ परमेश्वर में ल्योलिन हो जाता है वह जन्म मरण के चक्कर से छुट जाता है |

इसलिए अब तुम नाम स्मरण करते हुए दशम द्वार रूपी छत पर चढो | उस दशम द्वार के आकाश में नौबत (अनहद शब्द) बज रही है |

आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज कहते हैं की वह परमेश्वर सब से श्रेष्ट है, शुद्ध है, शब्द ही उस की पहचान है , और उस की बानी विहंगम है हृदय में प्रकाश करने वाली है |

 

                        

अदली आरती अदल बखाना  , कोली बुने विहंगम ताना         || १ ||

ग्यान का राच्छ ध्यान की तुरिया , नाम का धागा निश्चये जुरिया || २ ||

प्रेम की पान कमल की खाडी , सुरति का सूत बुने निज गाडी    || ३ ||

नूर की नाल फिरै दिन राती , जा कोली कुं काल न खाती       || ४ ||

कुल का खूंटा धरनी गाडा , गहर गझिना ताना गाढा            || ५ ||

निरति की नली बुने जे कोई , सो तो कोली अबचल होई       || ६ ||

रेजा राजिक का बुन दीजै , ऐसे सतगुरु साहिब रीझे           || ७ ||

दास गरीब सोई सत कोली , ताना बुन है अर्स अमोली         || ८ ||

 

न्यायप्रिय परमेश्वर की आरती हमेशा उस न्याय प्रिय परमेश्वर का वर्णन करने मे ही है |

आगे आचार्य श्री गरीब दास जी महराज साधक को कोली अर्थात कपडा बुनने वाला बुनकर की उपमा देते हैं | जिसतरह एक बुनकर कपडा बुनने के लिए सब से पहले रुई को इकठा  करता है फिर ध्यान पूर्वक चरखा चलाकर रुई से धागा बनाता है, फिर उस धागे के गोले बनाता है | फिर एक बर्तन में रंग डाल कर उस में इन गोलों को रंगता है | फिर इन धागों के गोलों से वस्त्र बनाता है |

उसीतरह परमेश्वरीय प्रेम में रंगा वस्त्र बुनने के लिए साधक पहले संतों, महापुरषों से या ग्रंथों से उस सर्व व्यापक परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करे, फिर उस ज्ञान का बारंबार मनन, ध्यान करे (जैसे चरखा एक ही जगह बार बार फिरता है) और उस ध्यान से उत्पन नाम (सूत्र बद्ध/रूप  ज्ञान का सार) को निश्चय पूर्वक अपने अंदर दृढ करता/जोडता है | साधक के अंदर नाम दृढ हो जाता है तो उसे प्रेम का रंग चढ जाता है और वह हमेशा सहस्त्र दल कमल में ध्यान लगाकर परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को गहरा करता रहता है| इस तरह साधक परमेश्वरीय रंग में रंगे कपडे (संसार) को बुनता है |

जो साधक दिन रात परमेश्वर के सिमरन में खोया रहता है | उस साधक(कोली) को काल नहीं खा  सकता |

हम सभी का संसार इस धरती पर आधारित है या हम सभी इस धरती पर खूंटे की तरह गड़े हुए हैं और हम इस धरती पर इस खूंटे के इरद गिरद अपने संसार का गहरा और जटिल जाल बुनते हैं और उस जाल में फंसकर विचलित हो जाते हैं | लेकिन जो साधक तल्लीन होकर निरंतर परमेश्वर को याद रखते हुए इस संसार रूपी जाले में विचरता है वह कभी भी विचिलित नहीं होता वह अवचल हो जाता है | इसलिए तुम सब को रिजक देने वाले उस परमेश्वर को याद रखते हुए ऐसा सांसारिक वस्त्र (रेजा) बनाओ जिससे की वह सतगुरु, सतपुरुष, साहिब तुम पर प्रसन्न हो जाए |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की सच्चा साधक वही है जो आकाश के समान व्यापक अमूल्य ब्रह्म की प्राप्ति के लिए साधना करता है (ताना बुनता है)|

 

                              

अदली आरती अदल अजूनी , नाम बिना है काया सूनी || १ ||

झूठी काया खाल लुहारा , इला पिंगला सुषमन द्वारा || २ ||

कृतघनी भूले नर लोई  , जा घाट निश्चये नाम न होई || ३ ||

सो नर किट पतंग भवंगा , चौरासी में धरि है अंगा    || ४ ||

उद्भिज खानी भुगतै प्राणी , समझै नहीं शब्द सह्दानी || ५ ||

हम है शब्द शब्द हम माही , हम से भिन्न और कुछ नहीं || ६ ||

पाप पुन्न दो बिज बनाया , शब्द भेद किन्हें पाया     || ७ ||

शब्दै सर्व लोक में गाजे , शब्द वजीर शब्द है राजे   || ८ ||

शब्दै स्थावर जंगम जोगी , दास गरीब शब्द रस भोगी || ९ ||

न्यायप्रिय परम पिता परमेश्वर की आरती जीव को चौरासी लाख योनियों से मुक्त करके अदल तत्व अर्थात परमात्म तत्व मे लीन करने वाली है | जहाँ पर बारम्बार जन्म नहीं लेना पडता इसलिए इसे अजूनी कहा गया है | उस परमेश्वर के नाम के बिना यह शरीर सुना (बेकार) है |

परमेश्वर के नाम के बिना यह शरीर झूठा है, परमेश्वर के नाम के बिना यह शरीर लोहार की खाल के समान है जिसमे इला और पिंगला के दो द्वारों से हवा सुष्मना के अंदर आती और बाहर जाती है | जो लोग परमेश्वर के एहसान को भूल गये हैं उनके हृदय में परमेश्वर के नाम का निश्चय नहीं हो होता |  ऐसे लोग किट, पतंगों, और सर्प जैसी चौरासी लाख योनियों में शरीर धारण करते हैं | ऐसे लोग वृक्ष इत्यादी चारों योनियों को भुगतते हैं | उन्हें शब्द ब्रह्म की पहचान नहीं हो पाती |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की हम ही शब्द ब्रह्म हैं और शब्द ब्रह्म हमारे में ही है हमसे भिन्न यहाँ और कुछ नहीं | अर्थात हम सब जगह व्याप्त हैं, सभी कुछ हममे व्यापत है| हमारे बिना यहाँ कुछ भी नहीं |

पाप और पुण्य दो प्रवृतियाँ बना दी गई हैं | ज्यादातर लोग इन दोनों में ही उलझे रहते हैं|

पाप, पुण्य के भेद से उपर उठकर शब्द ब्रह्म का भेद जानने वाले बहुत कम लोग होते हैं |

 

[लोगों में पाप और पुण्य के प्रति बहुत अलग अलग तरह की अवधारणाये हैं| इनमे से कुछ तो सही हैं और कुछ गलत | सही मायने में कृतघ्नता (परमेश्वर के एहसान को भूल जाना) सब से बड़ा पाप है इसी के कारण मनुष्य नीच (कम चैतन्य या जड ) योनियों की तरफ जाता है | कृतज्ञता के साथ परमेश्वर का स्मरण ही सबसे बड़ा पुण्य है इसीसे मनुष्य सचेतन हो कर मुक्त होता है | ]

 

सभी लोकों में शब्द ब्रह्म गूंज रहा है | यही शब्द जीवात्मा (वजीर) है और यही शब्द परमात्मा (राजा) है | शब्द ब्रह्म ही स्थिर रहने वाले (स्थावर) और चलने फिरने वाले (जंगम) जोगी हैं |

आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज कहते  हैं की हम शब्द ब्रह्म का रस पान करते हैं |

 

                        

अदली आरती अदल जमाना , जम जौरा मेटू तलबाना    || १ ||

धर्मराय पर हमरी धाई , नौबत नाम चढो ले भाई        || २ ||

चित्र गुप्त के कागज किरूं , जुगन जुगन मेटू तकसिरू     || ३ ||

अदली ग्यान अदल इक रासा , सुन कर हंस न पावै त्रासा || ४ ||

अजराईल जुरावर दाना , धर्मराय का है तलवाना         || ५ ||

मेटू तलब करूं तागिरा , भेटे दास गरीब कबीरा          || ६ ||

न्यायप्रिय परम पिता परमेश्वर की आरती को अपने हृदय में पक्का (जमाना ) करो | जिससे की हम यमराज और उसकी पत्नी जौरा के भेजे फरमान को मिटा दें | हे भाईयो, नाम का बाजा बजा दो क्योंकी हम धर्मराज पर धावा बोलने वाले हैं | हम चित्र और गुप्त के द्वारा लिखे कागजों को फाड कर तुम्हारे जुगों जुगों के कर्मो को मिटा देंगें |

न्यायप्रिय परमपिता का ज्ञान और उसकी रास (बातें) को सुनकर साधक सभी कष्टों से छूट जाता है |

अजराईल नाम का ताकतवर राक्षस धर्मराज का आज्ञा पत्र लेकर आता है | आचार्य श्री गरीबदास जी माहराज कहते हैं की हम धर्मराज की आज्ञा को मिटा देंगे क्योंकि हमें सतगुरु कबीर साहिब जी मिले हैं |

 

                     

       अदली आरती अदल पठाऊ , जुगन जुगन का लेखा ल्याऊ    || १ ||

            जा दिन नाथे पिण्ड न प्राना , नहीं पानी पवन जिमी असमाना || २ ||

            कच्छ मच्छ कुरम्भ न काया , चंद सुर नहीं दीप बनाया      || ३ ||

            शेष महेश गणेश न ब्रह्मा , नारद शारद न विश्कर्मा          || ४ ||

            सिद्ध चौरासी ना तेतिसो , नौ अवतार नहीं चौबीसों           || ५ ||

            पांच तत्व नाहीं गुण तीना , नाद बिन्द नाही घट सीना       || ६ ||

चित्र गुप्त नहीं कृतम बाजी , धर्मराय नहीं पंडित काजी        || ७ ||

धुंधुकार अनन्त जुग बीते , जा दिन कागज कहु किन चीते    || ८ ||

जा दिन थे हम तख्त खवासा, तन के पाजी सेवक दासा      || ९ ||

संख जुगन परलौ परवाना , सत पुरुष के संग रहाना         || १० ||

दास गरीब कबीर का चेरा , सत लोक अमरापुर डेरा          || ११ ||

न्यायप्रिय परमेश्वर की आरती न्यायपूर्वक बतलाता हूं | जिससे जुग जुगान्त्रों का लेखा जोखा हो सके | जिस दिन ना शरीर था, ना प्राण थे, ना पानी था, ना पवन थी, ना पृथ्वी थी और  ना ही आकाश था |

जब ना कच्छप अवतार, ना मत्स्य अवतार, ना कुर्म अवतारों के शरीर थे | जब चंद्र, सूर्य तथा दीप आदि भी नहीं बनाए थे | जब ना शेष नाग जी थे, ना महादेव जी थे, ना गणेश जी थे, ना ब्रह्मा थे, ना नारद थे, ना सरस्वती जी थी, और ना विश्वकर्मा जी थे | जब ना चौरासी सिद्ध थे, ना तेतीस करोड देवता थे, ना नौ अवतार थे, और ना चौविस अवतार थे | जब ना पांच तत्व थे, ना सत्व, रज, तम यह तिन गुण थे | ना नाद सृष्टि थी, ना बिन्द सृष्टि थी, ना घट था, ना सीना | जब ना चित्र थे, ना गुप्त थे, ना ब्रह्मा की कृत्रिम सृष्टि थी, ना धर्मराय थे, ना पंडित, ना काजी थे|

जब अंधकार में ही अनंतों युग बित गए | उस दिन लेखे जोखे के कागज किसने लिखे ? उस समय हमने पारब्रह्म के तख्त की सेवा की, हम उसके दास बनकर उसके समीप ही रहे | इस प्रकार अनंतों युग बित गए, प्रलय के समय की यह प्रमाणित बात है, हम उस समय सत पुरुष के साथ ही थे |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की हम कबीर साहिब के चेले हैं और सतलोक अमरापुर में हमारा डेरा है |

                                                

            ऐसी आरती पारख लीजै , तन मन धन सब अर्पण कीजै    || १ ||

            जाकै नौ लख कुंज दिवाले भारी, गोवर्धन से अनन्त अपारी  || २ ||

            अनन्त कोटि जाकै बाजे बाजे , अनहद नाद अमर पुर साजे || ३ ||

            सुन्न मंडल सत लोक निधाना , अगम दीप देख्या अस्थाना || ४ ||

            अगर दीप मे ध्यान समोई , झिलमिल झिलमिल झिलमिल होई || ५ ||

                        ताते खोजो काया काशी , दास गरीब मिले अविनाशी  || ६ ||

इस प्रकार की आरती को परखकर उस परमेश्वर के चरणों में तन, मन, और धन सब कुछ अर्पण कर देना चाहिए |

उस परमेश्वर के नौ लाख तंग गलियां हैं और उसके मंदिर गोवर्धन पर्वत के समान भारी और अनन्त गुणा उचे हैं और उनका पार नहीं पाया जा सकता | उसके यहाँ  अनन्त कोटि बाजे बज रहें हैं, वह परमेश्वर अमरपुर (ऐसा जिसका नाश ना हो ) में विराजमान है और उस के यहाँ अनहद नाद बज रहें हैं |

जो सुन्न मंडल (अफुर स्थान) और सत लोक का कारण है वह अगम दीप (स्थान) हमने देखा है | उस अगम दीप में ध्यान लगाने से झिलमिलाता हुआ प्रकाश दिखाई देता है |

आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज कहते हैं इसलिए इस शरीर रूपी काशी को खोजो जिस से तुम्हे इसमें रहने वाला नाश रहित (अविनाशी) परमात्मा मिल सके |

 

                                       

            ऐसी आरती अपरम पारा , थाके ब्रह्मा वेद उचारा      || १ ||

            अनन्त कोटि जाके शम्भु ध्यानी, ब्रह्मा शंख वेद पढे बानी || २ ||

            इन्द्र अनन्त मेघ रस माला , शब्द अतीत बिरध नहीं बाला || ३ ||

            चंद सुर जा के अनन्त चिराग , शब्द अतीत अजब रंग बागा || ४ ||

            सात समुद्र जाके अंजन नेना , शब्द अतीत अजब रंग बैना || ५ ||

            अनन्त कोटि जाके वाजे बाजैं , पूर्ण ब्रह्म अमरपुर छाजै   || ६ ||

            तीस कोटि रामा औतारी , सीता संग रहंती नारी     || ७ ||

            तीन पद्म जाके भगवाना , सप्त नील कन्हवा संग जाना || ८ ||

            तीस कोटि सीता संग चेरी , सप्त नील राधा दे फेरी     || ९ ||

            जाके अर्ध रोम पर सकल पसारा, ऐसा पूरण ब्रह्म हमारा   || १० ||

            दास गरीब कहे नर लोई , यौह पद चिन्है बिरला कोई || ११ ||

            गरीब सतबादी सब संत हैं , आप आपने धाम|

            आजिज की अरदास है , सकल संत प्रणाम || १२ ||

इस तरह की यह आरती सब से श्रेष्ट है इसका कोई अंत नहीं | वेदों के द्वारा इस आरती का बखान करते करते ब्रह्मा जी भी थक गए | उस परमेश्वर का करोडों शंकर जी ध्यान कर रहे हैं | न जाने कितने ही ब्रह्मा वेद वाणी के द्वारा उस का उच्चार कर रहें हैं | उसके यहाँ अनंतों इंद्र जल से भरे बादल लिए खड़े हैं | वह अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक जो शब्द से पहले (अतीत) है, वह ना बुढा है, ना बालक है | अर्थात वह हर समय एक जैसी स्थिति में है |

उसके यहाँ सूरज और चाँद के जैसे रौशनी देने वाले ना जाने कितने दीपक हैं | उस शब्द अतीत परमेश्वर के यहाँ अजब तरह के बाग बगीचे हैं |

सातों समुद्र उस परमेश्वर के नेत्रों में लगे सुरमे के समान हैं | उस शब्द अतीत परमेश्वर के यहाँ अजीब तरह के शब्द हैं | उस के यहाँ अनन्त कोटि बाजे बज रहे हैं और वह पूर्ण ब्रह्म अमरपुरी में सुशोभित हो रहा है |

उसके यहाँ तीस करोड रामचंद्र जी के अवतार हो चुके हैं और हर बार सीता जी नारी रूप में अवतार धारण करती रही हैं |

उसके यहाँ तीस हजार अरब (तीन पद्म) भगवन के अवतार हो चुके हैं | भगवान कृष्ण जी के सत्तर हजार अरब (सप्त नील) अवतार हुए हैं |

तीस करोड बार सीताजी राम अवतार में दासी बन कर आई और सत्तर हजार बार राधाजी भगवान कृष्ण जी के साथ घूम चुकी हैं |

उपर कहा हुआ सारा पसारा परमपिता परमेश्वर के बाल का जो रोम होता है उस के आधे भाग पर पसरा हुआ है | ऐसा हमारा यह पूर्ण ब्रह्म है |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की हे मनुष्यों इस पद को कोई बिरला ही व्यक्ति पहचान सकता है | अर्थात उस परमेश्वर को पाना हर किसी के बस की बात नहीं |

आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की जो सत को धारण करते हैं उस का बखान करते हैं वह सभी संत अपनी अपनी जगह पूज्य हैं | मेरी सब संतों से प्रार्थना और प्रणाम है |

    

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