
भगत जयदेव की कथा
आचार्य श्री गरीब दास जी ने अपनी वाणी में भगत जयदेव
जी का वर्णन किया है| जयदेव जी एक महान भगत और कवी थे | आप जी का संस्कृत भाषा में
रचा हुआ ‘गीत गोविन्द’ बहुत प्रसिद्ध है |
आप का जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिल्हे में, सूरी
के नजदीक केंदुली गाँव में पिता भोइदेव के घर माता बामदेवी की कोख से हुआ| आप की गणना महान
कवियों में की जाती है | आप बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन के दरबार के पांच रत्नों
में से एक थे | आप बचपन से ही संस्कृत के महान कवी थे | जयदेव हमेशा परमेश्वर भगति
में खोए रहते थे |

विवाह
आप जी का विवाह पद्मावती से हुआ | पद्मावती जगन्नाथ
में रहने वाले ब्राह्मण की कन्या थी | युवा होने पर पद्मावती के पिता पद्मावती को
मंदिर में नृत्य करने के लिये दान करने को ले गए | मंदिर में मूर्ति ने पद्मावती
को संत जयदेव को अर्पण करने को कहा |
पद्मावती के पिता ने जयदेव को जा कर सारा वृतांत
सुनाया और पद्मावती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की लेकिन काफी
अनुग्रह के बाद भी जयदेव ना माने | इस पर पद्मावती के पिता पद्मावती को जयदेव के
पास यह कह कर छोड़ गए की मै प्रभु की आज्ञा का उलंघन नहीं कर सकता | जाते समय पिता ने
पद्मावती को जयदेव के साथ रहने और उनकी सेवा करने का निर्देश दिया |
पद्मावती जयदेव जी की जी जान से सेवा करने लगी | आप
की सेवा से प्रसन्न हो कर और परमेश्वर की इच्छा का सत्कार करते हुए जयदेव ने
पद्मावती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया|
रचनाएँ
१. रसना राघव
२. गीत गोविन्द
३. चंद्रलोक
जयदेव जी की प्रसिद्ध रचना गीत गोविंद है | संस्कृत
में होने के वावजूद यह आज भी इतना प्रसिद्ध है की यह भारत के कुछ राज्यों में आज
भी गाया जाता है | गीत गोविन्द प्रेम और माधुर्य से परिपूर्ण है |
गीत गोविन्द भगवान कृष्ण और राधा पर आधारित है| जिसमे
राधा भगवान कृष्ण से नाराज हैं क्योंकि कृष्ण राधा को छोड़ कर अन्य गोपियों से
प्रेम करने लगते हैं और भगवान राधा जी को मनाने की कोशिश करते हैं |
जब जयदेव गीत गोविन्द लिख रहे थे तो एक प्रसंग उन के
हृदय में आया जिस में भगवान कृष्ण राधा को मनाने की खातिर कहते हैं की ‘हे राधे तुम अपने चरण कमलों को
मेरे शिर पर रखो’ लेकिन
जयदेव जी को इस प्रसंग पर शंका हुई और इसे बीच में अधूरा छोड़ कर विचार करते हुए आप स्नान करने चले गए | जब वापिस आ कर
देखा तो अचंभित रह गए की जैसा उन्होंने सोचा था वैसा ही शलोक लिखा हुआ पाया | पत्नी से पूछा तो पत्नी ने बताया की आप खुद हि आए थे और इसे
लिखकर वापिस स्नान करने चले गए | इस पर जयदेव जी समझ गए की स्वयं भगवान यह
पंक्तियाँ लिख कर गए हैं |
संयोग से उडीसा के राजा सात्विक ने गीत गोविन्द के
जैसी, उसी विषय पर आधारित एक अच्छी कविता लिखी| उस कविता को उसने ब्राह्मणों को उन
की प्रतिक्रिया जानने को दिया| ब्राह्मणों ने राजा को उसी विषय पर जयदेव का रचा
गीत गोविन्द दिखाया और राजा की कविता की त्रुटियाँ बताते हुए आलोचना की | परन्तु
राजा अपने अभिमान के कारण अपनी रचना को कम मानने को तैयार नहीं था | समाधान के
लिये उसने अपनी और जयदेव की रचना को मंदिर की मूर्ति के सामने फैसला करने के लिये
रख दिया | मूर्ति ने जयदेव की रचना को ग्रहण किया और राजा की रचना को नकार दिया |
लज्जित हो कर राजा ने आत्महत्या करने का निश्चय किया | इस पर भगवान राजा के समक्ष
प्रगट हो कर बोले की राजन जयदेव की रचना निश्चित ही तुम से श्रेष्ट है लेकिन
तुम्हारी रचना भी सराहनीय है इसलिए जयदेव के गीत गोविंद के हर बारह पदों के बाद
तुम्हारे एक शलोक को शामिल किया जायेगा | और ऐसा ही किया गाया |
ठगों से मुलाकात
आचार्य श्री गरीब दास महाराज जी ने इस घटना का पूरा वर्णन वाणी में किया है|
गरीब दासी पुत्र छाडि करि, जयदेव रामति कीन्ह |
राजा पूज्या जानि करि, मोहर असरफी दिन || १ ||
गरीब एक वर्ष जयदेव रहे, राजा के अस्थान |
संत चले हैं नगर कूं, पुजा करी निदान || २ ||
गरीब छापे तिलक बनाय करि, ठग चाले हैं साथ |
गल में फांसी डारि करि, काटे दोनूं हाथ || ३ ||
गरीब जयदेव डारे कूप में, लई मातरा माँग |
बालदि उतरी आनि करि, बनजार्यों की दांगी || ४ ||
गरीब जयदेव काढेया कूप सै, नायक पूछी बात |
कहो जहां पहुंचाए दे, औषध लाई हाथ || ५ ||
गरीब जयदेव म्याने बैठी करि, गये नगर उस धाम |
राजा आगेई मिले, सुना संत का नाम || ६ ||
गरीब द्वादश वर्ष दया करी, बैठे बाग मंजार |
राजा रानी शिष्य भये, दीन्हीं जग जौनार || ७ ||
गरीब बीते द्वादश वर्ष जद, परे तीन दुरभंश |
वै ठग मांगत आईया, जयदेव दर्शन अंछ || ८ ||
गरीब जयदेव कूं आदर किया, ठग बैठाये पास |
करें आधिनि बंदगी, वै ठग भये उदास || ९ ||
गरीब राजा सै जयदेव कह्या, ये दो मित्र हमार |
इन की पुजा कीजिये, ले अपना जन्म सुधार || १० ||
गरीब एक वर्ष राखे तहाँ, छप्पन भोग खवाय |
चाले जब पुजा करी, दीन्हा माल लदाय || ११ ||
गरीब घोरे जोरे बहु दिये, थैली दीनी बीस |
जयदेव राजा पुजा करी, देते चले आशिश || १२ ||
गरीब संग बुलाये तोबची, दिये कुमैति साथ |
आनंद मंगल बहु भये, चाले करते बात || १३ ||
गरीब हद सेती बाहर भये, कीन्हा ठगों जुहार |
जयदेव तुमरा क्या लगै, हम सै कहो विचार || १४ ||
गरीब झूठे कपटी चोर ठग, कृतघ्नी कलि मांही |
जयदेव की निंदा करी, साहिब सोचे नाहीं || १५ ||
गरीब रानी सै खोटा किया, जयदेव पकरे आय |
जा दिन इसके कर कटे, हमों छुटाया जाय || १६ ||
गरीब शिला छुटी असमान से, आये संपट बीच |
धरती में गारत गये, वै ठग दोनों नीच || १७ ||
गरीब जब जयदेव कूं कर मले, हर हर किया हजूर |
दोनों पंजे दस्त के, होय गये भरपूर || १८ ||
गरीब जयदेव सै राजा कहै, कारण कौन अगाध |
विधि संयोग बताइये, परम स्नेही साध || १९ ||
गरीब साध शिला नीचे दबे, मित्र हमारे प्राण |
राजा सै जयदेव कहै, बुझ हमारा ज्ञान || २० ||
गरीब करुना सेती कर बंधे, प्रश्न करौ दयाल |
वै दोनों गारत गये, शिला परी अबदाल || २१ ||
गरीब पूरबला संयोग कुछ, मैं जानत हूँ काहि |
मित्र हमारे मर गये, जयदेव दीनी धाहि || २२ ||
गरीब तेज पुंज के हो गये, जयदेव संत सुजान |
पिंड तुम्हारा नूर का, दरगह आंव दिवान || २३ ||
गरीब चाकर चरवादार सब, आये राजा पास |
कैसै वै दोनूं मुये, हमसे कहो सुवास || २४ ||
गरीब स्वामी की निंदा करी, काढे ऐब सबाब |
शिला परी अजगैब सै, आया नहीं जुबाब || २५ ||
गरीब जयदेव सै राजा कहै, कारण कौन दयाल |
बदन तुम्हारा नूर का, वै भक्षण किये काल || २६ ||
गरीब जयदेव राजा सै कहै, लीला अगम अपार |
पूरबला संयोग कुछ, हुई जजो होनै हार || २७ ||
गरीब दरगह बीच निसाफ है, दम दम लेखा होय |
जयदेव के कर कटी गये, जानत है सब कोय || २८ ||
गरीब जयदेव ने नाहीं कही, तीनू लोक अवाज |
जरना ऊपर होत है, सब हि पूरन काज || २९ ||
गीत गोविन्द की रचना के बाद जयदेव जी बहुत प्रसिद्ध
हो गए थे | जयपुर के राजा के आमंत्रण पर आप उन से मिलने जयपुर गए | विदाई के समय
राजा ने जयदेव जी की पुजा की और उन्हें मोहरे और अशर्फियाँ दी | रास्ते में जयदेव
को संतों के भेष में दो ठग मील गए जो उन के साथ हो लिये | रास्ते में ठगों ने जयदेव
जी को लुट कर उनके दोनों हाथ काट दिए और एक
सूखे गहरे कुँए में मरने के लिये फैंक दिया | लेकिन परमेश्वर की कृपा से जयदेव बच
गए और परमेश्वर को पुकारने लगे | उसी और से उत्कल देश को जाने वाले बंजारों की
टोली निकली, उन्होंने कुंए में से किसी को पुकारते सुना तो जयदेव जी को बाहर निकाला और उन के कटे हुए हाथों
और जख्मों पर औषध लगाई | टोली के नायक जयदेव को अपने साथ अपने नगर ले गए| राजा ने
जब जयदेव का नाम सुना तो आकर जयदेव जी से मिले | राजा ने जयदेव की भगति को देख कर एक
बाग में उनके रहने की व्यवस्था की और हर सुविधा मुहिया करवाई | जयदेव जी १२ वर्ष
वहाँ पर रहे और राजा रानी दोनों जयदेव के शिष्य हो गए | एक दिन वह दोनों ठग साधु
का वेश बना कर मांगते हुए वहाँ आए| जयदेव ने उन्हें पहचान लिया लेकिन राजा को उनकी
सच्चाई न बता कर यह कहा की यह दोनों हमारे मित्र है आप इन की सेवा कर के अपना जीवन सफल
कीजिये | राजा ने उन दोनों की बहुत सेवा की, वह दोनों ठग जयदेव के इस व्यव्हार से
बहुत चकित हुए | दोनों जयदेव के वैभव को देख कर बहुत जलने लगे| एक वर्ष तक ठग वहाँ
रहे, राजा और जयदेव ने उनकी बहुत सेवा की | जाते समय राजा ने बीस थैली दी, साथ में
कुछ सिपाही और नौकर दे कर विदा किया | जब सभी नगर के बाहर पहुंचे तो दोनों ठग
जयदेव की निंदा करते हुए कहने लगे की इस ने रानी से सम्बन्ध बनाया तो राजा ने इस
के हाथ काट दिए उस दिन हमने ही जा कर इस को छुडवाया था | ऐसा कहने पर परमेशर ने
कुपित हो कर एक बड़ा पत्थर छोडा और वह दोनों धरती ने समा गए | उधर जयदेव जी ने अपने
दोनों हाथों को हरि हरि कहते हुए मलना शुरू किया तो उनके दोनों हाथ पुरे के पुरे
हो गए | आप जी ने परमेश्वर का धन्यवाद किया | सभी चकित रह गए |
ठगों के साथ गए नौकरों ने आ कर राजा को सारी कहानी
सुनाई | जब राजा के द्वारा जयदेव को पता चला की उन के मित्र मर गए तो जयदेव दुखी हो
कर रोने लगे |
राजा ने जयदेव से सारा कारण जानना चाहा तो आप ने कुछ
भी नहीं कहा | बस इतना ही कहा की जो होना होता है वही होता है | राजा ने जयदेव को प्रणाम
किया |
आचार्य श्री गरीब दास महाराज जी जयदेव जी के इस
दयालु और सह लेने की प्रवृति की प्रशंसा करते हुए कहते हैं
गरीब दरगह बीच निसाफ है, दम दम लेखा होय |
जयदेव के कर कटी गये, जानत है सब कोय || २८ ||
गरीब जयदेव ने नाहीं कही, तीनू लोक अवाज |
जरना ऊपर होत है, सब हि पूरन काज || २९ ||
रानी द्वारा पद्मवातिकी परीक्षा
इस घटना के बाद जयदेव ने राजा से कहा की उन्हें घर
की याद आ रही है और वह अब घर जाना चाहते हैं | राजा ने आप को नगर में ही रहने की
बनती की और जयदेव जी की पत्नी पद्मावती को भी जा कर ले आए | पाद्मावती महल में
रहने लगीं और रानी उन की सेवा करती थी |
एक दिन रानी अपने भाई की मृत्यु पर उन के साथ सती
हुई उस की पत्नी की प्रशंसा कर रही थी तो पद्मावती मुस्कराने लगीं | रानी ने जब आप
से कारण पूछा तो पद्मावती ने कहा की रानी सच्ची सती तो वह है जो पति की मृत्यु
की खबर सुन कर ही शरीर त्याग दे| इस पर रानी ने पद्मावती की परीक्षा लेने की सोची
|
एक समय जब जयदेव जी किसी काम से बाहर गए हुए थे तो
रानी का एक सेवक दौड़ा हुआ आया और पद्मावती से बोला की जयदेव जी जंगल से गुजर रहे
थे तो एक शेर उन्हें खा गाया | इतना सुनते ही पद्मावती मृत के समान जमीन पर गिर गई
| रानी को अपने किये पर बहुत ही पछतावा हुआ | जब राजा को इस बात का पता चला तो वह
रानी पर बहुत कुपित हुआ | रानी ने चिता बनाकर खुद को दहन करने का फैसला किया | उधर
सारी खबर जयदेव को मिली तो उन्होंने आकर रानी को ऐसा करने से रोका | जयदेव जी पद्मावती
के मृत शरीर के पास जा कर अष्टपदी गाने लगे पद्मावती जी उठ कर बैठ गई और जयदेव जी
के साथ अष्टपदी गाने लगी| सभी के खुशी की कोई सीमा न रही |
इसके बाद जयदेव और पद्मावती बंगाल में अपने घर आकर
रहने लगे |
इति