
प्रार्थना
यह प्रार्थना आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज द्वारा रचित श्री ग्रन्थ साहिब (वाणी) में से श्री १०८ स्वामी ब्रह्म सागर जी महाराज (भुरीवाले) जी के आदेश से उनके शिष्यों ने संग्रह करके इसे आरती के साथ जोड़ दिया | तभी से यह प्रचलित हो गया है | इसमें से कुछ साखियाँ महामंडलेश्वर श्री स्वामी दयाल दास जी महाराज द्वारा रचित हैं |
गुरु ज्ञान अमान अडोल अबोल है, सतगुरों शब्द सेरी पिछानी |
दास गरीब कबीर सतगुरु मिले , आन अस्थान रोप्या छुडानी || १ ||
दीन के जी दयाल , भक्ति बिर्द दीजिये | खाने जाद गुलाम अपन कर लीजिये || टेक ||
खाने जाद गुलाम , तुम्हारा है सही | मेहरबान महबूब , जुगन जुग पत रही || १ ||
बांदी का जाम गुलाम , गुलाम गुलाम है | खडा रहै दरबार, सु आठों जाम है || २ ||
सेवक तलबदार , दर तुम्हारे कूक हीं | औगुन अनन्त अपार, पडी मोहि चूक ही || ३ ||
मै घर का बांदी जादा, अर्ज मेरी मानिये | जन कहता दास गरीब अपन कर जानिये || ४ ||
गुरू जी द्वारा दिए हुए ज्ञान को मापा नहीं जा सकता, यह ज्ञान हमेशा स्थिर है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता | श्री सतगुरु देव जी ने शब्द के द्वारा उस मार्ग की पहचान करवा दी | महाराज गरीबदास जी कहते हैं की हमें कबीर साहिब जी सतगुरु के रूप में छुडानी में आकर मिले और हमने अपना स्थान यहीं पर स्थापित किया |
हे दीन दुखियों पर दया करने वाले परमात्मा मुझे अपनी भगति दीजिये | मुझे अपना खानदानी गुलाम बनाकर अपना कर लीजिए |
हे प्रभु ! मैं आप जी का सही खानदानी दास हूं | हे कृपालु प्यारे आप मेरी जुग जुगान्त्रों से लाज रखते आए हो |
मैं आपकी दासी से पैदा हुआ आपका गुलाम हूं | मैं आप के दरबार में चौबीसों घंटे खडा रहूँ ऐसी कृपा करो |
मैं आपका सेवक आपकी सेवा की इच्छा से आपके दर पर पुकार रहा हूं | मुझमें अनंतों अवगुण हैं, मुझसे असंख्य भूलें हुई हैं जिनके कारण मैं भटक गया हूं |
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की हे परमेश्वर मैं आपकी दासी से पैदा हुआ आपका खानदानी गुलाम हूं, आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मुझे आपना बना लीजिए |
गरीब जल थल साक्षी इक है, डूंगर डहर दयाल | दशों दिशा कू दर्शन, ना कही जौरा काल || १ ||
गरीब जै जै जै करुणामयी, जै जै जै जगदीश | जै जै जै तुं जगतगुरु, पूर्ण बीसवे बीस || २ ||
राग रूप रघुवीर है, मोहन जाका नाम | मुरली मधुर बजाव ही, श्री गरीब दास बलि जाव || ३ ||
गरीब बांदी जाम गुलाम की, सुनियों अर्ज अवाज | यौह पाजी संग लीजियो, जब लग तुम्हरा राज || ४ ||
गरीब परलो कोटि अनन्त है, धरनी अम्बर धौल | मैं दरबारी दर खडा, अचल तुम्हारी पौल || ५ ||
गरीब समरथ तुं जगदीश है, सतगुरु साहिब सार | मैं शरणागति आइया, तुम हो अधम उधार || ६ ||
गरीब संतों की फुलमाल है, बरणों बित अनुमान | मैं सबहन का दास हूं, करो बंदगी दान || ७ ||
महाराज श्री गरीबदास जी कहते हैं की जल में, थल में, सब जगह वह एक साक्षी परमेश्वर रमा हुआ है| ऊँचे ऊँचे पहाड़ों से ले कर गहरी खाइयों में वह दयालु परमेश्वर रमा हुआ है | दसों दिशाओं में उसी परमेश्वर के दर्शन होते हैं और कहीं भी काल व्याप्त नहीं है |
हे कोमल हृदय वाले प्रभु ! तेरी जय हो, हे जगत के ईश तेरी जय हो, हे जगत गुरु तेरी बारंबार जय हो | हे प्रभु आप परिपूर्ण हो |
हे प्रेम स्वरुप रघुवीर आपका ही नाम मोहन है | आप सुरीली मधुर मुरली बजाने वाले हो | मैं गरीब दास आप पर बलिहारी जाता हूं |
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की आप की दासी से पैदा हुए इस गुलाम की प्रार्थना भरी पुकार कृपा करके सुनो | अपने इस अपराधी को आप अपने संग ले लीजिए, जब तक आपका राज है |
हे प्रभु ! अनन्त कोटि महाप्रलय हो चुकी हैं जिनमे पृथ्वी, आकाश, पाताल सब कुछ खत्म हो जाते हैं | लेकिन मैं आप का दरबारी आपके दर पर खडा आप के मुख्य द्वार को हमेशा ही अचल देखता हूं |
हे सतगुरु साहिब आप सर्व शक्तिमान हो, समर्थ हो, जगत के ईश्वर हो, सबके सार स्वरुप, पूर्ण ब्रह्म हो | मैं आपकी शरण में आया हूं क्योंकि आप नीचों का उद्धार करने वाले हो |
आप सब संत माला के फूलों के सामान हो | मैं आपका वर्णन अपने अनुमान से की करता हूं | मैं आप सबका दास हूं कृपा करके आप मुझे भक्ति भाव दान दें |
गरीब अर्ज अवाज अनाथ की, आजिज की अरदास | आवन जाना मेटिया, दीन्हा निश्चल बास || ८ ||
गरीब सतगुरु के लक्षण कहूं, चाल बिहंगम बीन | सनकादिक पलडे नहीं, शंकर ब्रह्मा तीन || ९ ||
गरीब दुजा ओप न आपकी, जेते सुरनर साध | मुनियर सिद्ध सब देख्या, सतगुरु अगम अगाध || १० ||
गरीब सतगुरु पूर्ण ब्रह्म है, सतगुरु आप अलेख | सतगुरु रमता राम है, या मे मीन न मेख || ११ ||
पूर्ण ब्रह्म कृपा निधान, सुन केशो कर्तार | गरीबदास मुझ दीन की, रखियो बहुत संभार || १२ ||
गरीब पंजा दस्त कबीर का, सिर पर राखो हंस | जम किंकर चंपे नहीं, उधार जात है बंस || १३ ||
अलल पंख अनुराग है, सुन मंडल रहे थीर | दास गरीब उधारिया, सतगुरु मिले कबीर || १४||
हे प्रभु ! मुझ अनाथ की, आपके सेवक की आपसे बिनती है | आपने अनेकों शरण में आये हुओं का आने जाने का चक्कर मिटा कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया है | आप मुझ पर भी यह कृपा कीजिये |
महाराज श्री गरीबदास जी सतगुरु के लक्षण बताते हुए कहते ही की सतगुरु की चाल (गति) विहंगम अर्थात हंस पक्षी के सामान है जो दूध और पानी को अलग अलग कर देता है| सतगुरु की बानी मधुर है | सतगुरु की तुलना सनकादिक चारों और शंकर आदि तीनों देवता भी नहीं कर सकते |
हे सतगुरु देव ! आपकी महिमा के समान दूसरा कोई नहीं | मैंने सब देवी, देवता, मनुष्य, महात्मा, साधु, मुनिजन और सिद्धों को देखा है| किन्तु आप के समान कोई भी नहीं | आपकी गति अपार है, उसे कोई नहीं जान सकता |
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की सतगुरु परिपूर्ण पार ब्रह्म परमेश्वर हैं और सतगुरु जी आप लिखने में नहीं आ सकते | सतगुरु जी राम स्वरुप हैं और हर जगह रम रहे हैं इसमे तनिक भी शंका नहीं |
हे पूर्ण ब्रह्म, हे कृपा के सागर, हे केशव, हे कर्तार ! मुझ गरीबदास दीन की हर प्रकार से देख रेख करना बहुत संभाल करना |
महाराज जी कहते हैं की हे हंसो सतगुरु कबीर साहिब का हाथ (आशीर्वाद) अपने सिर पर रखलो जिससे जम दूत तुम्हारे निकट नहीं आएंगे और तुम्हारे पुरे वंश का उद्धार हो जायेगा |
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की हमें सतगुरु श्री कबीर साहिब जी मिले जिन्होंने हमारे अनुराग को अलल पक्षी के समान कर शुन्य मंडल में स्थिर करके हमारा कल्याण कर दिया, हमें मुक्त कर दिया |
सरणा पुरुष कबीर का, सब संतन की ओट | गरीब दास रक्षा करें, कबहू न लागे चोट || १५ ||
(यह साखी महा मंडलेश्वर श्री स्वामी दयाल दास जी के द्वारा रचित है |)
स्वामी जी कहते हैं की जो श्री कबीर साहिब जी की शरण है, सब संतों का सहारा लेता है उसकी गरीबदास जी महाराज सब प्रकार से रक्षा करते हैं और उसकी कभी कोई हानी नहीं होती |
गरीब सतबादी के चरण की, सिर पर डारू धूर | चौरासी निश्चय मिटै, पहुंचे तख्त हजूर || १६ ||
शब्द स्वरूपि उतरे, सतगुरु सत कबीर | दास गरीब दयालु है, डिगे बधावै धीर || १७ ||
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की जो सत्य का पालन करने वाले हैं ऐसे महापुरषों के चरणों की धुल को सिर पर धारण करने से चौरासी लाख योनियों के चक्र से निश्चय ही छुटकारा मिल जाता है और वह सतगुरु के परम धाम हजूर साहिब में सतगुरु के समीप रहता है |
महाराज जी कहते हैं की शब्द स्वरुप, सत पुरुष सतगुरु कबीर साहिब जो अति दयालु हैं सतलोक से उतर कर आए और गिरे हुए प्राणियों निराश्रितों को धैर्य बंधाया |
कर जोरू बिनती करूं, धरूं चरण पर शीस | सतगुरु दास गरीब है, पूर्ण बीसवे बीस || १८ ||
नाम लिए सब बढे, रिन्चक नहीं कुसुर | गरीब दास के चरण की, सिर पार डारूँ धूर || १९ ||
(यह साखियाँ महा मंडलेश्वर श्री स्वामी दयाल दास जी के द्वारा रचित है |)
स्वामी जी कहते हैं की मैं दोनों हाथ जोड़ कर बिनती करता हुआ सतगुरु देव आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज के चरणों पर सिर रखता हू क्योंकि वह परिपूर्ण ब्रह्म के ही अवतार हैं |
स्वामी जी कहते हैं की श्री गरीबदास जी का नाम लेने से सभी महापुरषों की बढाई हो जाती है अर्थात उनकी प्रतिष्ठा होती है इससे लेश मात्र भी अपराध नहीं लगता | इसलिए मैं श्री गरीब दास जी महाराज के चरणों की धूलि को अपने सिर पर डालता हूं |
गरीब जिस मंडल साधू नहीं, नदी नहीं गुंजार | तज हंसा वह देसाडा, जम की मोटी मार || २० ||
गरीब जिन मिलते सुख ऊपजै, मेटे कोटि उपाध | भवन चतुर्दश ढूँढिए, परम स्नेही साध || २१ ||
सतगुरु जी कहते हैं की जिस स्थान पर साधु नहीं होते या साधुओं का सतसंग नहीं होता और ना ही कोई पुण्य दायिनी नदी गुंजार करती हुई बहती हो , हंसो उस देश को त्याग दो क्योंकि वहाँ के निवासियों पार जम की भारी मार पडती है |
सतगुरु जी कहते हैं की जिनके मिलने पर, दर्शन से सुख की प्राप्ति होती हो और करोडों अपराध मिट जाते हों ऐसे परम स्नेही संतों को चौदह भुवनों में ढूँढना चाहिए |
बन्दी छोड दयाल जी, तुमलग हमरी दौर | जैसे काग जहाज का, सूझे और न ठौर || २२ ||
(यह साखी महा मंडलेश्वर श्री स्वामी दयाल दास जी के द्वारा रचित है |)
स्वामी जी कहते हैं की हे बन्दी छोड ! परम दयालु जी हमारी तो आप तक ही पहुंच है आप ही हमारा सहारा हो | जिस प्रकार समुद्र में चलते जहाज पर बैठे पक्षी को और कोई ठिकाना नहीं सूझता उसी प्रकार हमें भी आपके चरणों के सिवा कोई आश्रय नहीं दीखता |
साधु माई बाप है, साधु भाई बंध | साध मिलावै राम से, काटे जम के फंद || २३ ||
बिना धनि की बंदगी, सुख नही तीनों लोक | चरण कमल के ध्यान से, गरीब दास संतोष || २४ ||
परोपकारी संत ही माँ, बाप, भाई, बहन हैं यही संत परमात्मा से मिलाकर यमराज के फंदों को काटने वाले हैं |
सतगुरु श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की परमपिता परमात्मा (धनि) की भक्ति के बिना तीनों लोकों में सुख नहीं है | उस परमपिता परमात्मा के चरण कमलों में ध्यान लगाने से ही संतुष्टि, सुख-शांति मिलती है |
|| शब्द ||
तारेंगे तहतिक सतगुरु तारेंगे तहतिक || टेक ||
घट ही मे गंगा, घट ही मे जमुना | घट ही मे है जगदीश || १ ||
तुम्हरा ही ज्ञाना तुम्हरा ही ध्याना, तुम्हरे तारन की परतीत || २ ||
मन कर धीर बाँध ले रे बौरे, छड दे नै पिछल्यों की रीत || ३ ||
दास गरीब सतगुरु का चेरा, टारेंगे जम की रसीत || ४ ||
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की अपने मन के अंदर दृढ निश्चय करो की सतगुरु आपको इस भवसागर से अवश्य पार उतार देंगे | इस शरीर के अंदर ही गंगा जी, शरीर के अंदर ही यमुना जी हैं और इसी शरीर के अंदर इस जगत के स्वामी, ईश्वर हैं | अर्थात शरीर के अंदर ही सभी तीरथ मौजूद हैं परम पवित्र गंगा, और जमुना मौजूद हैं इसलिए तुझे बाह्य तीर्थों पर घूमने की जरुरत नहीं | परमेश्वर भी इसी शरीर में मौजूद हैं | इसलिए तुं अपने अंदर स्थित परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर, उसी परमेश्वर का ध्यान कर और ऐसा विश्वास कर की सतगुरु देव मुझे अवश्य तार देंगे |
महाराज जी कहते हैं की हे बावरे अपने मन में धैर्य उत्पन्न करो, और अब से पहले परमेश्वर प्राप्ति के लिए तुम जो भी क्रिया कर्म करते आए हो उन सभी पुरानी लकीर के फकीर वाली रीतों को छोड दो |
आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज कहते हैं की जो भी व्यक्ति सतगुरु का दास, सेवक या शिष्य बनेगा| सतगुरु उसके यमराज के कागज पत्रों को फाड देंगे |